29.5.17

होम्योपैथिक औषधि बेलाडोना ( Belladonna ) का गुण लक्षण उपयोग



बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती हैलक्षण
(1) शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन
(2) रक्त-संचय की अधिकता तथा सिर दर्द, प्रलाप, पागलपन
(3) दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है।
(4) रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना
(5) प्रकाश, शोर, स्पर्श सहन न कर सकना
(6) मूत्राशय की उत्तेजितावस्था
(7) असहिष्णु-जरायु से रक्तस्राव
(8) हिलने-डुलने, शीत, स्पर्शादि से रोग-वृद्धि
(9) दाईं तरफ प्रभाव करनेवाली औषधि है।
(10) दोपहर 3 बजे से रात तक रोग-वृद्धि
लक्षणों में कमी
(i) हल्का ओढ़ना पसन्द करना
(ii) बिस्तर में विश्राम पसन्द
(iii) गर्म घर में सोना पसन्द
लक्षणों में वृद्धि
(i) छूने से, गंध से, शब्द से
(ii) वायु की झोंकें से वृद्धि
(iii) हिलने-डोलने से वृद्धि
(iv) दिन के 3 बजे से रात तक वृद्धि
(v) सूर्य की गर्मी से रोग-वृद्धि
(vi) बाल कटवाने से रोग-वृद्धि
*शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन –
 बेलाडोना के शोथ में उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन इसके विशिष्ट लक्षण है। इन तीनों की स्थिति निम्न है:
भयंकर उत्ताप – फेफड़े, मस्तिष्क, जिगर, अंतड़ियों अथवा किसी अन्य अंग में शोथ हो तो भयंकर उत्ताप मौजूद होता है। इस रोगी की त्वचा पर हाथ रखा जाय, तो एकदम हटा लेना पड़ता है क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती है। इतनी भयंकर गर्मी के हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी की याद बनी रहती है। रोगी के किसी अंग में भी शोथ क्यों न हो, उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता है।
*टाइफॉयड के उत्ताप में बेलाडोना न दे – 
टाइफॉयड में अगर इस प्रकार का उत्ताप मौजूद भी हो, तो भी उसमें बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिये। इसका कारण यह है कि औषधि की गति तथा रोग की गति में सम-रसता होना आवश्यक है। बेलाडोना की शिकायतें यकायक, एकदम, बड़े वेग से आती हैं और यकायक ही चली भी जाती हैं। टाइफॉयड यकायक नहीं आता, धीरे-धीरे आता है और धीरे-धीरे जाता है। बेलाडोना की गति और टाइफॉयड की गति में सम-रसता नहीं है, इसलिये इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। बेलाडोना उसी ज्वर में देना उचित है जिसमें ज्वर यकायक आये, धीमी गति से न आये। बेलाडोना में ताप होता है, बेहद ताप, भयंकर ताप।
*रक्तिमा – 
बेलाडोना के शोथ में दूसरा मुख्य-लक्षण रक्तिमा है। अंग के जिस स्थान पर शोथ हुआ है, वह बेहद लाल दिखाई देता है। लालिमा के बाद इसका रंग हल्का पड़ सकता है, कुछ काला पड़ सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि विशेष रूप से पहचाना न जाय परन्तु शुरू में चमकीला लाल होता है। शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा, ऐसा जैसे अंगारा हो, फिर उसका रंग फीका पड़ सकता है, परन्तु शुरू में देखते ही लाल रंग होता है।
*बेहद जलन – बेलाडोना के शोथ में तीसरा मुख्य-लक्षण बेहद जलन है। शोथ में, ज्वर में, रक्त-संचय में, टांसिल में बेहद जलन होती है। इतना ही नहीं कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय, रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है। उदरशोथ (Gastritis) में पेट में जलन होती है। इस प्रकार उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन-ये तीनों बेलाडोना औषधि में मुख्य स्थान रखते हैं।
*आंख दुखना जिसमें उत्ताप, रतिमा और जलन हो – 
आंख में गर्मी, रक्तिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं, उनके मौजूद होने पर यह इसे ठीक कर देता है। आँख से पानी आना, रोशनी में आंख न खोल सकना, आंख में गर्मी लाली और जलन के बाद कभी-कभी आख में ‘टीर’ (Squint) रह जाता है। उसे बेलाडोना औषधि ठीक कर देती है।
*उत्ताप, रक्तिमा, तथा जलन के लक्षणों में सूजन, आंख दुखना, डिसेन्ट्री, बवासीर तथा गठिया के रोग – 
यह हम कह चुके हैं कि बेलाडोना में तीन लक्षण आधारभूत हैं उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन। इन तीन को ध्यान में रखते हुए यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि शोथ, आँख दुखना, डिसेन्ट्री तथा बवासीर में इसकी कितनी उपयोगिता है। इनके अलावा जहां भी ये तीन लक्षण हों, वही बेलाडोना उपयोगी है।
*सूजन जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 अगर किसी अंग में सूजन हो जाय, सूजन के स्थान को छुआ तक न जा सके – स्मरण रहे कि स्पर्श के लिये असहिष्णुता बेलाडोना औषधि का चरित्रगत-लक्षण है – दर्द हो, ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा, इसके साथ उस स्थान में गर्मी, लाली और जलन हो, तो बेलाडोना औषधि है, सूजन के विषय में स्मरण रखना चाहिये कि अगर सूजन के बाद सूजन पकने लगे तब बेलाडोना लाभ नहीं कर सकता, पकने से पहले की अवस्था तक ही इसकी सीमा है।
*डिसेन्ट्री जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 रोगी बार-बार जोर लगाता है, मुँह तपने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, सिर और चेहरे पर जलन शुरू हो जाती है, हाथ-पैर ठन्डे और सिर गर्म, बहुत जोर लगाने पर भी बहुत थोड़ा मल – ऐसी डिसेन्ट्री में बेलाडोना लाभप्रद है।
*बवासीर जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
ऐसी बवासीर जिसमें सख्त दर्द हो, मस्से बेहद लाल हों, सूज रहे हों, छुए न जा सकें, जलन हो, रोगी टांगें पसार कर ही लेट सके – ऐसी बवासीर में बेलाडोना लाभ करेगा।
*गठिया जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
गठिये में जब सब या कुछ जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में उत्ताप, लाली और जलन होती है। ऐसी गठिये में उत्ताप, रक्तिमा और जलन मौजूद रहते हैं। इसके साथ रोगी स्वयं ‘असहिष्णु’ (Sensitive) होता है और जोड़ों को किसी को छूने नहीं देता। जरा-सा छू जाने से उसे दर्द होता है। वह बिस्तर पर बिना हिले-जुले पड़ा रहना चाहता है। जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शान्त पड़ा रहता है। बेलाडोना का रोगी शीत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़े से लिपटा रहता है, हवा के झोंके से परेशान हो जाता है, गर्मी से उसे राहत मिलती है।
*रक्त-संचय की अधिकता तथा सिद-दर्द – 
अभी हमने उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन का उल्लेख किया। उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन क्यो होते हैं? इसका कारण रुधिर का किसी जगह एकत्रित हो जाना है। बेलाडोना इस प्रकार रुधिर के किसी अंग-विशेष में संचित हो जाने पर औषधियों का राजा है। यह रक्त-संचय कहीं भी हो सकता है – सिर में, छाती में, जरायु में, जोड़ों में, त्वचा पर-शरीर के किसी भी अंग पर यह संचय हो सकता है। इस प्रकार के रुधिर-संचय में विशेष लक्षण यह है कि यह बड़े वेग से आता है और एकदम आता है। हम अभी देखेंगे कि लक्षणों का वेग से आना और एकदम जाना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम जाते हैं, इसके रोगों की गतियां मन्द वेग से नहीं चलती। बिजली के से वेग से आना बेलाडोना की विशेषता है। बच्चा जब सोया था तब बिल्कुल ठीक था, परन्तु मध्य-रात्रि में ही एकदम उसे दौरा पड़ गया, हाथ्र-पैर ऐंठने लगे, पेट में दर्द उठ खड़ा हुआ – ये सब एकदम और वेग से आने वाले रक्त-संचय के लक्षण बेलाडोना औषधि के हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण हाई-ब्लड प्रेशर की भी यह उत्कृष्ट दवा है।
 
*रक्त-संचय से सिरदर्द – 
रक्त की गति जब सिर की तरफ़ चली जाती है तब सिर दर्द होने लगता है। बेलाडोना में भयंकर सिर-दर्द होता है। ऐसा दर्द मानो सिर में कुछ छुरे चल रहे हों। बेलाडोना का रोगी हरकत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी नहीं सह सकता। बच्चा बिस्तर पर पड़ा सिर-दर्द से चीखता है, तकिये पर सिर इधर-उधर पटकता है यद्यपि सिर का हिलना सिर-दर्द को और बढ़ाता है। यह सिर-दर्द सिर में रक्त-संचय के कारण होता है। जब ज्वर तेज हो तब ऐसा सिर-दर्द हुआ करता है। रोगी अनुभव करता है कि रुधिर सिर की तरफ दौड़ रहा है। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता है और हाथ-पैर ठंडे होते हैं, आंखें लाल, कनपटियों की रंगों में टपकन होती है, लेटने से सिर-दर्द बढ़ता है, रोगी पगड़ी से या किसी चीज से सिर को कस कर बांधता है, तब उसे आराम मालूम देता है।
*रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना – 
बेलाडोना के इन दो लक्षणों को भूला नहीं जा सकता। रोग बड़े वेग से, प्रचंड रूप में आक्रमण करता है, और यह आक्रमण यकायक होता है। ‘प्रचंडता’ और ‘एकाएकपना’ इस औषधि के मूल में पाया जाता है। किसी प्रकार का दर्द हो, प्रचंड सिर-दर्द, धमनियों का प्रचंड-स्पन्दन, प्रचंड-डिलीरियम, प्रचंड-पागलपन, प्रचंड-ऐंठन। रोग की प्रचंडता और एकाएकपने में एकोनाइट तथा बेलाडोना का सादृश्य है, इसलिये इनकी तुलना कर लेना आवश्यक है।
*रक्त के सिर की तरफ़ दौर से प्रलाप – 
बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबर्दस्त होता है कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की-सी अवस्था हो जाती है। यद्यपि उसे नींद आ रही होती है तो भी वह सो नहीं सकता। वह सिर को तकिये पर इधर-उधर डोलता रहता है। कभी-कभी वह प्रगाढ़ निद्रा में जा पहुंचता है जिसमें उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं। वह देखता है हत्याएं, डाकू, आगजनी। वह प्रलाप भी करने लगता है – उसे भूत-प्रेत, राक्षस, काले कुत्ते, भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े दिखाई देने लगते हैं। यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने का परिणाम है।
*पागलपन –
 जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक हो जाता है, तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती है। वह अपना भोजन मंगवाता है, परन्तु खाने के बजाय चम्मच को काटने लगता है, तश्तरी को चबाता है, कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता और भौंकता है। वह अपना गला घोंटने का प्रयत्न करता है, और दूसरों को कहता है कि वे उसकी हत्या कर दें। हाय-हाय करना – इस औषधि की विशेषता है। ठीक हालत में हो या न हो, वह हाय-हाय किये जाती है। जल्द-जल्द कुछ बड़बड़ाता जाता है जिसका कुछ अर्थ नहीं होता। उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिये वह भाग या छिप जाना चाहता है। उसका पागलपन उत्कट उन्माद का रूप धारण कर लेता है जिसमें वह तोड़-फोड़, मार-काट, गाली-गलौज करता है। दूसरों पर थूकता है, दांत पीसता, किटकिटाता है। डॉ० नैश ने पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है – बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम। इनकी तुलना निम्न प्रकार है।
*पागलपन में बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम की तुलना – 
इन तीनों को मस्तिष्क के रोगों की औषधि कहा जा सकता है। बेलाडोना में उन्माद की प्रचंडता प्रधान है, हायोसाइमस में प्रचंडता नहीं होती, निरर्थक गुनगुनाना प्रधान होता है, प्रचंडता तो कभी-कभी ही आती है। बेलाडोना का चेहरा लाल, हायोसाइमस का चेहरा पीला और बैठा हुआ होता है। हायोसाइमस कमजोर होता है, और कमजोरी बढ़ती जाती है। इस कमजोरी के कारण उसके उन्माद में प्रचंडता देर तक नहीं रह सकती। हायोसाइमस की शुरूआत प्रचंडता से हो सकती है परन्तु कमजोरी बढ़ने के साथ वह हटती जाती है। स्ट्रैमोनियम में उन्माद की प्रचंडता पहली दोनों औषधियों से अधिक है। वह चिल्ला-चिल्लाकर गाता, ठहाके मारकर हँसता, चिल्लाता, प्रार्थना करने लगता, गालियां बकने लगता-बड़ा बकवादी हो जाता है। उन्माद की प्रचंडता में स्ट्रैमोनियम तीनों से अधिक, फिर बेलाडोना, और सब से कम हायोसाइमस है। प्रचंडता के अतिरिक्त अन्य लक्षणों को भी निर्वाचन के समय ध्यान में रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, बेलाडोना प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, स्ट्रैमोनियम अन्धेरे को नहीं सहन कर सकता। बेलाडोना अन्धेरा चाहता है, स्ट्रैमोनियम प्रकाश।
*दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है – 
लक्षणों का बड़े वेग से आना, और एकदम आना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। इसी लक्षण का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि कोई भी दर्द एकदम आये और एकदम ही चला जाये, तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता है। सर्दी लगी, एकदम दर्द शुरू हुआ, बीमारी ने अपना जितना समय लगाना था लगाया, और दर्द जैसे एकदम आया था वैसे एकदम शान्त हो गया। कभी-कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता है। स्ट्रैमोनियम में दर्द मीठा-मीठा शुरू होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, उच्च-शिखर पर जाकर फिर धीरे-धीरे शान्त होता है। मैग्नेशिया फॉस का सिर-दर्द एकाएक आता है, चिरकाल तक बना रहता है और एकाएक ही जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में धीरे-धीरे शुरू होता है, पर एकदम जाता है।
बेलाडोना और एकोनाइट की तुलना – 
ये दोनों औषधियों हृष्ट-पुष्ट शरीर के लोगों के लिये उपयोगी हैं। हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ बच्चा या एक तगड़ा नौजवान यह समझ कर कि उसे सर्दी क्या कर लेगी, ठंड में कम कपड़े पहन कर निकलता है और रात में ही या सवेरे तक शीत के किसी रोग से आक्रान्त हो जाता है। रोग का आक्रमण एकदम होता है और जोर से होता है। दोनों इस बात में समान हैं, परन्तु बेलाडोना में मस्तिष्क में तूफ़ान उठता है, बुखार के साथ असह्य सिर-दर्द हो जाता है, एकोनाइट में रुधिर की गति में तूफान उठता है, छाती या हृदय में दर्द हो जाता है, न्यूमोनिया, खांसी, जुकाम हो जाता है।


*मूत्राशय की उत्तेजितावस्था –
 बेलाडोना के अतिरिक्त दूसरी कोई औषधि ऐसी नहीं है जो मूत्राशय तथा मूत्र-नाली की उत्तेजितावस्था को शान्त कर सके। पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है। इस औषधि में स्पर्शादि को सहन न कर सकने का जो लक्षण है, उसी का यह परिणाम है। पेशाब बूंद-बूंद कर टपकता है और सारी मूत्र-नाली में दाह उत्पन्न करता है। सारा मूत्र-संस्थान उत्तेजित अवस्था में पाया जाता है। मूत्राशय में शोथ होती है। मूत्राशय में रक्त-संचय और उसके उत्तेजितावस्था होने के कारण उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता। मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती है। यह अवस्था मूत्राशय में मरोड़ पड़ने की-सी है। मूत्र में रुधिर आता है, कभी-कभी शुद्ध खून। ऐसी अवस्था में पायी जाती है कि मूत्राशय भरा हुआ है परन्तु मूत्र नहीं निकल रहा। शिकायत का केन्द्र स्थूल मूत्राशय की ग्रीवा है जहां मूत्राशय में थोड़ा-सा भी मूत्र इकट्ठा होने पर पेशाब जाने की हाजत होती है, परन्तु दर्द होता है मूत्र नहीं निकलता।
* प्रकाश, शोर, स्पर्श आदि सहन नहीं कर सकता – 
इस रोगी की पांचों इन्द्रियों में अत्यन्त अनुभूति उत्पन्न हो जाती है। रोगी आंखों से रोशनी, कानों से शब्द, जीभ से स्वाद, नाक से गंध, त्वचा के स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक करने लगता है, वह रोशनी, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को सहन नहीं कर सकता। उसका स्नायु-मंडल उत्तेजित रहता है। स्नायु-मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य-लक्षण है। ओपियम इससे ठीक उल्टा है। उसमें ‘सहिष्णुता’ (Sensitivity) रहती ही नहीं। बेलाडोना के रोगी में मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित होगा उतनी असहिष्णुता बढ़ जायगी। स्पर्श की असहिष्णुता उसमें इतनी होती है कि सिर के बालों में कघी तक नहीं फेर सकता, सिर के बालों को छूने तक नहीं देता। इस प्रकार की असहिष्णुता अन्य औषधियों में भी पायी जाती है। उदाहरणार्थ, हिपर पर रोगी दर्द को इतना अनुभव करता है कि बेहोश हो जाता है, नाइट्रिक ऐसिड का रोगी सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाज को सहन नहीं कर सकता, उससे उसकी तकलीफें बढ़ जाता हैं, कॉफिया का रोगी तीन मंजिल ऊपर के मकान पर भी किसी के चलने की आवाज सुन लेता है तो उससे परेशान हो जाता है यद्यपि अन्य किसी को वह आवाज नहीं सुनाई पड़ती, नक्स वोमिका के रोगी के शरीर की पीड़ा लोगों के पैरों की आहट से बढ़ जाती है।
बुखार
यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है।
पेट दर्द में
यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी।
सिर व गर्दन दर्द
यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है।
सूखी खांसी
सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी।
किसी भी तरह का दर्द
शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
जीभ की सूजन
जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें।
मासिक धर्म
महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें।
गले की सूजन
यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है।
कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।

वृषण (अंडकोश)में सूजन और दर्द के घरेलू आयुर्वेदिक इलाज /Pain in Testicles





अंडकोष क्‍या है
अंडकोष यानी टेस्टिस पुरुषों में पायी जाने वाली एक थैली है। अंडकोष की थैली के अंदर दो अंडकोष होते हैं। अंडकोष लाखों छोटे-छोटे शुक्राणु कोशिकाएं पैदा करते हैं और उन्हें सुरक्षित रखते हैं। इसके अलावा ये टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन भी बनाते हैं, एक ऐसा हार्मोन जिसके कारण लड़के शुक्राणु पैदा करते हैं। साथ ही टेस्‍टोस्‍टेरॉन मांसपेशियों और बालों के लिए जरूरी होता है। इसे मर्दाना हार्मोन भी कहते हैं।

अंडकोष को इंग्लिश में Scrotum कहा जाता है जो की एक पतली थैली के रूप में आदमी के लिंग के नीचे स्थित होती है| इस थैली में दो बहुत ही जरुरी अंग पाए जाते हैं जिन्हें हम testicles कहते हैं और जिनमें वीर्य का उत्पादन होता है| वैसे तो अंडकोष मोटी और मजबूत त्वचा का बना होता है लेकिन फिर भी कई प्रकार के रोग या बीमारी इसे ग्रसित कर सकते हैं और उनमें से सबसे ज्यादा पुरुषों को अंडकोष में दर्द और सूजन का सामना करना पड़ता है| अंडकोष में दर्द और सूजन right या left side अथवा दोनों और हो सकता है| पुरुष को अपने जीवन की किसी भी अवस्था में इस दर्द और सुजन का सामना करना पड़ सकता है|
अंडकोष का दर्द धीरे और लम्बे समय तक भी हो सकता है और कई लोगों में ये दर्द बहुत जयादा तेज भी हो सकता है| सही समय पर इस समस्या का निदान न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं| इसलिए यदि आपके अंडकोष में तेज दर्द और सूजन है तो आपको तुरंत किसी अच्छे urologist से मिलकर उसका इलाज करवा लेना चाहिए| लेकिन यदि आपकी प्रॉब्लम जयादा सीरियस नहीं है तो आप कुछ घरेलु नुस्खे अपनाकर pain और swelling को कम कर सकते हैं| लेकिन सबसे पहले अंडकोष में दर्द और सूजन करने वाले कारणों के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ा ली जाये|
वो कारण जो अंडकोष में दर्द और सुजन के लिए जिम्मेदार होते हैं
अंडकोष में दर्द और सूजन के कुछ प्रचलित कारणों में से कुछ नीचे दिए गये हैं | जरुरी नहीं की आपकी बीमारी के लिए ये ही कारण जिमेदार हों| इसलिए सही कारण का पता लगाने के लिए डॉक्टर से मिलना अनिवार्य हैं|
 

Inguinal hernia – इसे groin hernia भी कहते हैं| इसमें छोटी आंत या fatty tissue का कुछ भाग आपके अंडकोष में आकर दर्द और सूजन पैदा करता है| यह हर्निया अकसर भारी बोझ उठाने के कारण होता है| अकसर लोग gym में सीधे ही भारी भरकम बोझ उठा लेते हैं और हर्निया का शिकार हो जाते हैं|
Torsion – इस कंडीशन में आपकी स्पेर्मटिक कोर्ड मुड जाती है या ट्विस्ट हो जाती है और जिसके कारण आपके testes की और जाने वाला रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है| इसमें रोगी को बहुत तेज दर्द होता है| समय रहते इसका इलाज न हो तो permanent damageभी हो सकता है| यह एक आपातकालीन स्तिथि होती है|
Epididymitis – इसमें आपकी epididymis में inflammation या सोअज हो जाती है| Epididymis एक तुबे जैसी संरचना होती है जो की आपके दोनों testes के पीछे की और स्थित होती है| Epididymitis में रोगी को अंडकोष में असहनीय दर्द होता है| epididymis में inflammation होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे चोट लग जाना, बैक्टीरिया द्वारा संक्रमण. sexually transmitted disease जैसे chlamydia and gonorrhea आदि| Epididymitis ज्यादातर 18 से 36 वर्ष के लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है|
Orchitis – इस रोग में आपके testes में inflammation हो जाता है जो की बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के कारण होता है| ये inflammation एक ओर या दोनों ओर हो सकता है| इसमें अंडकोष में सुजन और दर्द रहने लगता है| यह ज्यादातर 45 या उससे बड़ी उम्र के पुरषों में अधिक देखने को मिलता है|
इनके अलावा अंडकोष में सूजन, दर्द और irritation के कई और कारन होते हैं जैसे अंडकोष में पानी भरना, हर्निया सर्जरी के बाद भी दर्द कुछ महीनों तक रहता है| इनके अलावा prostatitis, गांठ का होना, पथरी और मम्प्स होना भी दर्द और सूजन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं|
अंडकोष में सूजन और दर्द का इलाज / निदान
देखिये चूँकि यह पुरषों की बहुत ही sensitive स्थान होता है इसलिए कभी भी खुद डॉक्टर बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए खास कर तब जब तेज दर्द और दुसरे लक्षण जैसे चक्कर आना, जी मिचलाना, बुखार होना या गुप्तांग से गड़े पदार्थ का स्त्राव या लिंग से खून आना आदि हों | सही समय पर सही कारण का पता चलना और सटीक इलाज आपको आगे होने वाली परेशानी से बचा सकता है| लेकिन यदि आपको लगता है की आपकी प्रॉब्लम सीरियस नहीं है और बस हल्का फुल्का दर्द महसूस हो रहा है तो आपको कुछ घेरलू नुस्खे और सावधानियाँ अपनाकर उस दर्द से मुक्ति पा सकते हैं| नीचे कुछ जरुरी बातें बताई गयी हैं|
घरेलू आयुर्वेदिक उपाय 

बर्फ से सेकें
यदि अंडकोष में दर्द हो रहा हो तो बर्फ के टुकड़े से इसकी सिंकाई कीजिए, इससे आपको आराम मिलेगा। बर्फ के टुकड़े से अंडकोष की सिंकाई 10-15 मिनट तक करने से दर्द कम हो जाता है। यह एक प्रकार का अस्‍थायी उपचार है जिसमें तुरंत आराम मिलता है।खेलों में चोट से बचने के लिए protective कप और supporter जरुर पहने|
Epididymitis, पथरी, और संक्रमण की स्तिथि में अपने डॉक्टर से जरुरी दर्द निवारक दवा जैसे brufen, aspirin, paracetamol आदि और एंटीबायोटिक्स लिखवाकर नियमित रूप से लें|
कम कोलेस्ट्रॉल वाला खाना खाइए और दिन भर में ढेर सारा पानी पीजिये|
STD से बचने के लिए संभोग से पहले जरुरी सावधानियाँ बरतें|
हल्दी का लेप अंडकोष के बढ़ने यानि सूजन को कम करने में आपकी मदद कर सकता है|
अदरक के रस में शहद मिलकर पिने से लाभ मिलता है इसी प्रकार टमाटर, सेंधा नामक और अदरक का सलाद के रूप में सेवन करने से भी फायदा होता है|
अंडकोष में दर्द और सुजन से ग्रसित लोगों को डॉक्टर सबसे पहले आराम लेने की सलाह जरूर देता हैं| आपको सभी कार्य छोड़कर कुछ दिन bed rest लेना चाहिए| कोई ऐसा काम न करें जिससे आपके अंडकोष पर pressure पड़े|
गरम पानी से स्‍नान
टेस्टिकल्‍स के दर्द को कम करने के लिए गरम पानी से स्‍नान कीजिए। इसके अलावा बॉथ टब में पानी गरम करके आप थोड़ी देर तक बॉथ टब में रहने से भी दर्द कम हो जाता है। हल्‍के गरम पानी से सिंकाई भी कर सकते हैं।सामान्य दर्द और सुजन को आप बर्फ की सहायता से ख़तम कर सकते हैं| आपको बर्फ का टुकड़ा रुमाल या तौलिए में लपेटना है और दर्द वाली जगह पर कुछ मिनट्स के लिए लगाना है| ऐसा आपको हर 2 घंटे के 

अन्तराल में करना है|
यौन बीमारियों से बचाव
टेस्टिक्‍स में दर्द के लिए यौन संचारित बीमारियां भी जिम्‍मेदार हैं। यदि इनसे बचा जाये तो इसके कारण टेस्टिस में होने वाले दर्द से बचाव संभव है। इसलिए यौन संबंध बनाते वक्‍त ध्‍यान रखें और कंडोम का इस्‍तेमाल करें।

डॉक्टर या किसी जानकार की सलाह के अनुसार सही नाप का supporter या लंगोट का इस्तेमाल करें| इससे आपके अंडकोष को प्रयाप्त सहारा मिलेगा और दर्द में राहत|
कभी भी भारी भरकम बोझ न उठाएं और यदि जरुरी हो तो अपने फॅमिली members की मदद लें|

होम्योपैथिक उपाय -


अंडकोष की सूजन व दर्द(TESTICLES ORCHITIS AND NEURALGIA)
परिचय-
प्रमेह एवं गर्मी रोग के कारण अंडकोष और उसे ढकने वाली झिल्ली में सूजन व जलन पैदा होती है। अंडकोष में जलन होने पर पेशाब करते समय सफेद रंग का पदार्थ निकलता है। धीरे-धीरे अंडकोष सूजकर कठोर व बड़ा हो जाता है। वैसे तो अंडकोष फुल जाने पर किसी तरह का कष्ट नहीं होता है लेकिन सूजन अधिक दिनों तक रहने से अंडकोष पक जाता है।
रोग और उसमें प्रयोग की जाने वाली औषधियां :-
पल्सेटिला :-
यदि अंडकोष की सूजन की नई अवस्था हो तो इस औषधि का प्रयोग करें। किसी प्रकार की दवाईयों के प्रयोग से गोनोरिया को दबा देने के कारण से अंडकोष सूज गया हो तो पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना हितकारी होता है।यदि अंडकोष बढ़ गया हो, उन्हें छुने से दर्द हो, काला-लाल़ हो गया हो, वीर्य वाहिनी (वीर्य नलिकाएं) में दर्द हो और दर्द जांघों तक फैल रहा हो तो ऐसी स्थिति में उपचार के लिए पल्सेटिला औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। अगर गोनोरिया के दबाने से यह रोग हुआ हो और उसके दबने से पहले पीला नीला स्राव हुआ हो तो उपचार के लिए पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
ऐकोनाइट :-
यदि अंडकोष में सूजन होने के साथ बुखार रहता हो और रोगी बेचैनी महसूस करता हो तो उसके इस रोग का उपचार ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति से करना चाहिए। अंडकोष की नई प्रदाह में पल्सेटिला औषधि की 3x या एकोनाइट औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करने से जलन व सूजन दूर होती है विशेषकर बुखार रहने पर।
बेलाडोना :-
अंडकोष की सूजन में यदि स्नायुमण्डल अत्यंत उत्तेजित हो और तीव्र दर्द हो तो बेलाडोना औषधि का सेवन करना चाहिए।यदि अंडकोष सूज जाने के साथ ही वह गर्म व लाल हो गया हो तो बेलाडोना औषधि का उपयोग करने से सूजन व लाली दूर होती है।

रोडोडेन्ड्रन :-
अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में जब अंडकोष की सूजन कठोर होकर सूख जाए और रोगी को ऐसा महसूस हो जैसे कि अंडकोष को कुचल दिया गया हो। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए रोडोडेन्ड्रन औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
ऑरम-मेट :-
अंडकोष की पुरानी सूजन का प्रभाव यदि दाईं ओर की वीर्य वाहिनी (वीर्य नलिकाएं) में हो एवं उसमें दर्द हो तो ऑरम मेट औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
क्लेमेटिस :-
गोनोरिया के दब जाने के कारण यदि अंडकोष सूज गया हो तो पहले पल्सेटिला औषधि का सेवन करें। यदि पल्सेटिला औषधि से सूजन दूर न हो तो क्लेमैटिस औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करें। अंडकोष की सूजन में ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को अधिक कष्ट होता है, सर्दी लगती है, अंडकोष कठोर हो जाता है, दर्द होता है तथा रोग के लक्षण रात को व बिस्तर की गर्मी से बढ़ते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को क्लेमैटिस औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।यदि प्रमेह रोग के कारण अंडकोष सूज गया हो और उसमें जलन हो तो क्लेमेटिस औषधि की 3 से 6 शक्ति का सेवन करना चाहिए।

कोनायम :-
अंडकोष में खून प्रवाहित करने वाली नाड़ियों के अन्दर खून जमा होने के कारण शारीरिक शक्ति कम होना एवं संवेदनशीलता कम होना आदि लक्षण। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए कोनायम औषधि की 30 से 200 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।नपुंसकता के करने होने वाले अंडकोष की सूजन व जलन को दूर करने के लिए कोनायम औषधि की 3 शक्ति से उपचार करना चाहिए।
मर्क-बिन :-
उपदंश के कारण यदि अंडकोष की सूजन हुई हो तो उपचार के लिए मर्क-बिन 2x मात्रा का प्रयोग करना लाभकारी होता है।

स्पंजिया :-
 

अंडकोषों की सूजन कठोर हो जाने पर स्पंजिया औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है वि
शेषकर अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में। वीर्य वाहिनी की सूजन व अंडकोष में दर्द होना आदि लक्षणों में स्पंजिया औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है।अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में यदि सुई चुभने की तरह दर्द हो तो स्पंजिया औषधि की 2x मात्रा का उपयोग करना फायदेमंद होता है।ऊपर बताए गए औषधियों के अतिरिक्त अंडकोष की सूजन को दूर करने के लिए बीच-बीच में अन्य औषधियों का भी प्रयोग कर सकते हैं जो इस प्रकार हैं- आर्निका की 6, सिलिका की 6, हिपर की 30, सिपिया की 30, सल्फर की 30 या मर्क-3 आदि।
अंडकोष में दर्द होना :-
आरम-मेट :-
अंडकोष में दर्द होने पर ऑरम-मेट औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना हितकारी होता है।स्नायु-शूल की तरह यदि अंडकोष में दर्द हो तो आरम-मेट औषधि की 200 शक्ति का प्रयोग करना उचित होता है।
हैमामेलिस :-
अंडकोष में दर्द के कारण स्वप्नदोष होना, मन उदास रहना, चिड़चिड़ा हो जाना, स्वास्थ्य सम्बंधी चिंता से खिन्न रहना आदि। इस तरह के लक्षणों में हैमामेलिस औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है।अगर रोगी का अंडकोष सूज गया हो तथा बुखार हो गया हो, अंडकोष कड़ा होने के साथ रोगी अच्छा महसूस न कर रहा हो तो उसे हैमामेलिस औषधि की 2x मात्रा सेवन कराना चाहिए तथा हैमामेलिस- मदर टिंचर को 15 गुना अधिक पानी में मिलाकर अंडकोष पर लगाना चाहिए।

अविकसित अंडकोष :-
जिन बच्चों के अंडकोष का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है उसका कद छोटा रह जाता है। ऐसे में अंडकोष का विकास रुक जाने पर ऑरम-मेट औषधि की 3 शक्ति 0.30 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से अंडकोष का पूर्ण विकास होता है।

25.5.17

कान के अंदर बजने वाली घंटी और विभिन्न प्रकार की आवाज को रोकने के उपाय


तेज़ आवाज़ पर संगीत सुनने से कानों में अतिसूक्ष्म धमनियों के सिरे को क्षति पहुंचनें से लगातार घंटी सुनाई देती है जिसे टिनिटस (tinnitus) भी कहतें हैं। टिनिटस धमनियों के क्षतिग्रस्त होने या परिसंचरण तंत्र (circulatory system) में समस्या होने के कारण होता है।[१] हालांकि, कानों में घंटी बजने को रोक थाम कर के बचा जा सकता है, फिर भी कान को क्षति पहुंचने पर भी इसका इलाज किया जा सकता है। दिये गए सलाह और संकेत पढ़ें और लाभ उठाएँ।
टिनिटस के लक्षणों में आपके कानों में इस प्रकार की फैंटम (निचले से ऊँचे स्वर की) ध्वनियाँ आती हैं:
घंटी बजना
भिनभिनाहट
दहाड़ना
खटखटाना
फुफकारना
सीटी बजना
जोर से चिल्लाने की आवाज
कारण
कई प्रकार की चिकित्सीय स्थितियाँ टिनिटस उत्पन्न कर सकती हैं या बदतर कर सकती हैं। कई मामलों में, निश्चित कारण कभी मालूम नहीं पड़ता।
भीतरी कान की कोशिकाओं की क्षति।
आपके भीतरी कान में सूक्ष्म नाजुक बालों का होना।
आपके कान के भीतर की नसों को प्रभावित करने वाली चोटें या स्थितियाँ।
श्रवण शक्ति की आयु सम्बन्धी हानि।
उच्च या जोरदार शोर की चपेट।
कान के मैल का अवरोध।
हृदय या रक्तवाहिनियों के रोग।
मस्तिष्क में गठानें (ब्रेन ट्यूमर्स)।
महिलाओं में होने वाले हार्मोन सम्बन्धी परिवर्तन।
थाइरोइड सम्बन्धी असामान्य स्थितियाँ।
माइग्रेन सम्बन्धी सिरदर्द।
कानों में क्षणिक घंटी बजने का उपचार
टिनिटस के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए कुछ सामान्य चीजें हैं, जो आप स्वयं कर सकते हैं। इनमें हैं:
व्यायाम नियमित करें और विश्रांति हेतु समय निकालें।
पार्श्व ध्वनियों का स्तर निम्न रखें जैसे खिड़की का खुला होना या रेडियो का चालू होना।
धनिये के बीजयुक्त प्राकृतिक चाय टिनिटस से उत्पन्न परेशानी को कम करती है।

सिर को थपथपाने के उपाय का प्रयोग करें: आप किसी संगीत समारोह से घर वापस आ रहें हैं और आपके कानों से घंटी की आवाज़ नहीं बंद हो रही हो, तो यह कौकलिया में छोटे बालों को नुकसान पहुंचने के कारण धमनियों में सूजन, जलन और उत्तेजना उत्पन्न होती है। सिर को थपथपाने से ये लगातार आने वाली कष्टकर आवाज़ बंद हो सकती है।
कानों को अपनी हथेली से बंद करें। उँगलियाँ सिर के पीछे वाले हिस्से पर टिका लें। दोनों हाथों की मध्यमा उंगली सिर के पीछे एक दूसरे के सामने करें।अपनी प्रथमा उंगली को मध्यमा उंगली पर रखें।
चुटकी बजाने के तरीके से, अपनी प्रथमा उंगली को मध्यमा उंगली से सरका कर चुटकी की तरह सिर के नीचे वाले हिस्से पर थपथपाएँ। उँगलियों के सिर पर लाग्ने से ढोल जैसी आवाज़ आती है। ये काफी तेज़ होती है। ये सामान्य है।
ऊपर दिये गए तरीके से आप सिर के पीछे 40 से 50 बार चुटकी बजाएँ। 40 से 50 बार बजाने के बाद देखें कि घंटी कि आवाज़ कम हुई की नहीं।
 
इंतज़ार करें: 
बहुत तेज़ आवाज़ में संगीत सुनने के फलस्वरूप कानों में घंटी बजनें लगती है, और कुछ घंटों में बंद हो जाती है। आप उससे ध्यान हटाएँ जैसे कि आराम करें या ऐसी किसी चीज़ से दूर रहें जिससे ये समस्या और न बढ़े।
कानों मेँ घंटी बजने की दीर्घकालिक बीमारी का उपचार
*चिकित्सक की सलाह लें: अधिकतर, टिनीटस (tinnitus) या कान में घंटी बजनें की समस्या किसी अन्य बीमारी के इलाज के फलस्वरूप उत्पन्न हो सकती है। इसका इलाज करने से कानों में घंटी बजना कम ही नहीं बल्कि पूरी तरह भी समाप्त हो सकती है।
*आप अपने चिकित्सक से कानों की मैल (wax) को साफ करवाएँ। वैकल्पिक रूप से, आप भी बड़ी सवधानी के *साथ कान का मैल साफ कर सकतें हैं। कानों से मैल साफ करवाने के बाद आपको टिनीटस की बीमारी से आराम मिलेगा।
*चिकित्सक को अपनी रक्त वाहिनी (blood vessels) दिखाएँ। कमजोर हुई रक्त वाहिनियों की अवस्था से टिनीटस की बीमारी और बिगड़ सकती है।
*चिकित्सक से अपनी दवाई के संबंध में पुनः जांच करवा लें। अगर आप कोई दवाई लेते हैं तो डॉक्टर को
टिनीटस को आवाज़ प्रतिबंधित कर के रोक सकते हैं: विभिन्न प्रकार से आवाज़ को प्रतिबंधित कर, चिकित्सक घंटी की आवाज़ को बंद कर सकतें हैं। इन उपायों में विभिन्न प्रकार के उपकरण और विधियां बताई गई हैं।
व्हाइट नौइज़ मशीन (white noise machine) का उपयोग करें। “व्हाइट नौइज़ मशीन’ गिरती बारिश और हवा बहने जैसी प्रष्ठभूमि वाली आवाज़े निकालती है। ऐसी मशीन से निकली आवाज़ कानों में घंटी बजने की आवाज़ को डूबा सकती है।
*पंखा, नमी करने वाली मशीन (humidifier), नमी कम करने वाली मशीन (dehumidifier) और एयर कनडीशनर (A.C.) भी “व्हाइट नौइज़ मशीन” के समान काम करते हैं।

 
मासकिंग डिवाइस (कानों को ढकने वाला उपकरण) का प्रयोग करें। इसे कान पर लगा कर निरंतर ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है, जिससे परेशान करने वाली घंटी की आवाज़ को दबाया जा सकता है।
कानों में सुनने की मशीन (hearing aids) लगाएँ। टिनीटस के साथ यदि आपको कम सुनाई पड़ता हो, तो इस उपकरण का ज़्यादा असर होता है । ज़रूर बताएं, कहीं यह किसी दवाई के दुष्प्रभाव से तो नहीं हो रहा।
टिनीटस रोग के लक्षण को दवाई लेने से सुधार सकतें हैं: दवाई लेने के बावजूद घंटी की आवाज़ से पूर्ण रूप से छुटकारा नहीं मिलता, बल्कि यदि दवाई प्रभावशाली है, तो घंटी की आवाज़ कम सुनाई पड़ेगी।
डॉक्टर से एंटिडिप्रेसेंट के लिए परामर्श लें। गंभीर टिनीटस के लिए एंटिडिप्रेससेंट काफी कारगर सिद्ध होते हैं, परंतु इसके कुछ अनुचित दुष्प्रभाव होते हैं जैसे कि, मुँह सूखना, आँखों में धुंधलापन छाना, कब्ज़ एवं दिल के रोग।
एल्प्राज़ोलम लेने के लिए डॉक्टर से परामर्श लें। जनक्स (xanax) के नाम से प्रचलित, टिनिटस बुज़जिंग कम करने में अल्प्राजोलम काफी कारगर सिद्ध होती है, लेकिन इसकी लत लगने के, तथा अन्य दुष्प्रभाव होते हैं।
जिंकगो का प्रयोग करें: भोजन के साथ जिंकगो (ginkgo) के रस का दिन में तीन बार सेवन करने से सिर और गर्दन में खून का बहाव बढ़ जाता है, जिससे रक्तचाप से उत्पन्न घंटी बजना, कम हो जाता है।[३] जिंकगो का प्रयोग दो महीने करने के बाद उसके प्रभाव का आंकलन करें।
टिनिटस की रोकथाम
उन स्थितियों से बचें जिन से कॉक्लिया के क्षतिग्रस्त होने से टिनिटस होता है: क्योंकि टिटिटस का उपचार कठिन होता है, इसलिए इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका कि इससे बचें, या इसे और बुरा होने न दें। निम्न से टिनिटस के लक्षण बढ़ सकते हैं:
*तेज़ ध्वनि। संगीत के कार्यक्रम इसके प्रमुख दोषी हैं, परंतु हवाईजहाज, निर्माण कार्य, यातायात, गोली की आवाज़, पटाखे इत्यादि तेज़ आवाज़ इसके लिए हानिकारक हो सकते हैं।
*तैरना: तैरते समय पानी और क्लोरीन कान में फंस सकते हैं, जिससे टिनिटस बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए तैरते समय कान के प्लग (earplugs) का प्रयोग करें।
*अपने तनाव को दूर करने के लिए बाहर घूमने जाएँ: अगर आप तनाव से ग्रसित हैं तो लगातार कानों में घंटी बजने कि समस्या और भी बढ़ सकती है। अपने तनाव से बचनें के लिए व्यायाम, ध्यान और मालिश द्वारा रोगोपचार किया जा सकता है
*अल्कोहल, कैफीन और निकोटीन का कम से कम सेवन करें: इन सब से धमनियों पे दबाव पड़ने के कारण ये तन जातीं हैं। ये कान के भीतरी भाग में होता है। लक्षण कम करने के लिए तंबाकू, अल्कोहल, कॉफी और कैफीन युक्त चाय का सेवन न करें।
नमक का प्रयोग न करें: 
नमक, शरीर में खून का बहाव, कमजोर करता है, जिससे रक्तचाप और टिनिटस बढ़ सकते हैं।
परामर्श
कान में बजती घंटी को रोकने के लिए शरीर की प्रतिरक्षित व्यवस्था (immune system) को मजबूत करने का प्रयास करना होगा। ये आपको संक्रमण और बीमारियों से बचने में मदद करता है, जिससे कान में परेशान करने वाली ध्वनि कम हो सकती है। स्वास्थ में सुधार का मतलब है टिनिटस में भी सुधार। स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, निरंतर और उपयुक्त व्यायाम एवं भरपूर निद्रा शामिल हो
परहेज और आहारलेने योग्य आहार
रक्तसंचार को बढ़ाने हेतु ढेर सारा ताजा अन्नानास खाएँ।
लहसुन के गंधरहित कैप्सूल लें या उन्हें भोजन में पका लें। लहसुन सूजन घटाने और संचार बढ़ाने इन दोनों कार्यों में सहायक होता है।
अपने कच्चे फल, हरी सब्जियों और पकी दालों (फलियों) के सेवन को बढ़ाएं। यह आहार विटामिनों, एमिनो एसिड्स और वनस्पतिजन्य यौगिकों से समृद्ध होता है जो भीतरी कान की सूजन को कम करने में सहायक होते हैं।
सूखे फल और मेवों का सेवन करें. ये भी टिनिटस को प्राकृतिक रूप से कम करने में लाभकारी होते हैं।इनसे परहेज करें
नमक का प्रयोग कम करें और कैफीनयुक्त पेय पदार्थ ना लें।
धूम्रपान और शराब के प्रयोग को कम करें क्योंकि ये आपके कानों की ध्वनि को प्रभावित करते हैं।
एस्पिरिन (एसिटाइलसेलिसिलिक एसिड) का प्रयोग ना करें जो कि सैलिसिलिक एसिड से बनती है। एस्पिरिन के कारण कुछ लोगों के कानों में घंटी बजने की ध्वनि उत्पन्न होती पाई गई है।
 
योग और व्यायाम
अपने मुँह को जितना सम्भव हो खोलें, और फिर अपने हाथ को ठोढ़ी पर रखकर, अपने मुँह को और चौड़ा करें। इस स्थिति में 30 सेकंड रहें।
मुँह को सहायता द्वारा खोलना जबड़े को खोले वाले व्यायाम के समान कार्य करता है। अपना मुँह खोलें, फिर दो उँगलियों से सामने के निचले दांतों जकड़ें। अपने मुँह को कुछ और खोलें और कुछ सेकंड तक इस स्थिति में बने रहें। 10 बार दोहराएँ।
अपने मुँह को ढीला और हल्का खोलें, और अपने जबड़े को दाहिनी तरफ जितना हो सके ले जाएँ। अपनी बाईं मुट्ठी जबड़े के विरुद्ध रखें और 30 सेकंड तक दाहिनी और जबड़े को बनाए रखने के लिए दबाव डालें। इसके बाद दाहिनी मुट्ठी का प्रयोग बाएँ जबड़े पर करें। इसे चार बार दोहराएँ और ऐसा दिन में कुल चार बार करें।
कांच के सामने खड़े हों, दांतों को जोर से भींच लें, मध्य के दोनों दांतों की निचले जबड़े पर स्थिति पर एकाग्र हों। जबड़े को बाएँ या दाएँ घुमाए बिना, दोनों दांतों को केंद्र में रखते हुए, अपने मुँह को धीरे-धीरे खोलें। इसे दिन में 10 बार करें।
योग
टिनिटस के लक्षणों को दूर करने वाले योगासनों में हैं:
अधोमुख श्वानासन
उष्ट्रासन
मत्स्यासन
नावासन

बगल में पड़ने वाली गांठ के घरेलू आयुर्वेदिक उपाय



बगल में संक्रमण, एलर्जी या फंगल ग्रोथ के कारण गांठ की समस्‍या हो जाती है।कुछ छोटे-छोटे घरेलू उपायों से इस गांठ का इलाज किया जा सकता है।

बगल मे होने वाली गांठ के घरेलू उपचार 
पानी - 
पानी, शरीर को हाईड्रेट रखता है और इससे गांठ की सूजन भी कम होने लगती है। बॉडी हाईड्रेट रहने से रक्‍त का संचार अच्‍छी तरह होता है और बगलों में कोई क्‍लॉट या लम्‍प नहीं होते हैं।
. तरबूज - 
गर्मियों के दिनों में तरबूज का सेवन अवश्‍य करें। इससे शरीर में विषाक्‍तता समाप्‍त होगी और डिहाईड्रेशन भी नहीं होगा। साथ ही चमक भी आएगी। तरबूत के सेवन से बगल में गुंथ नहीं पड़ती है।
नींबू का रस - 
नींबू के रस में विटामिन सी होता है जो त्‍वचा में चमक ला देता है और किसी भी प्रकार की गांठ पड़ने से रोकता है। नींबू का सेवन अपने आहार में नियमित करें और गांठ से छुटकारा पाएं।
विटामिन ई - 
विटामिन ई से त्‍वचा सम्‍बंधी रोग सही हो जाते हैं। दूध, सब्जियों, मछली आदि में भरपूर मात्रा में विटामिन ई होता है, इनका सेवन करें।
प्‍याज -
 प्‍याज में एंटीबैक्‍टीरियल और एंटीमाईक्रोबायल गुण होते है जो बैक्‍टीरिया को मार देते हैं। इससे बगल की त्‍वचा साफ और गुंथरहित रहती है।
 
हल्‍दी- 
हल्‍दी में एंटीबैक्‍टीरियल और एंटीमाईक्रोबायल गुण होते हैं जो सूजन को कम करते हैं और धीरे धीरे गांठ ठीक हो जाती है। आप चाहें तो इस जगह पर हल्‍दी का पेस्‍ट हल्‍का गरम कर के लगा सकते हैं। या फिर हल्‍दी को डाइट में शामिल कर सकते हैं।
गरम पानी से सेकाई करें -
सिकाई करने से गांठ कम होनी शुरू हो जाती है। रोजाना गर्म पानी से बगल की सिकाई जरूर करें।
जरूरी सामान
- गर्म पानी
- छोटा टॉवल
इस तरह करें सिकाई
1. गर्म पानी में टॉवल को गीला करके निचोड लें।
2. इस टॉवल से 10-15 मिनट लगातार सिंकाई करें। जब टॉवल ठंड़ा हो जाए तो इसे दोबारा गीला कर लें। इस बात का ध्यान रखें कि पानी को जरूरत से ज्यादा गर्म न करें।
3. दिन में 2 बार सिंकाई जरूर करें।
मसाज -
रोजाना बगल की मसाज करने से भी गांठ को खत्म किया जा सकता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और सूजन भी कम होनी शुरू हो जाती है।
जरूरी सामान
- ऑलिव ऑयल
- नारियल तेल
इस्तेमाल का तरीका
1. इन दोनों तेलों की 2-2 बूंद लेकर उंगुलियों की मदद से गोलाई में बगल की मसाज करें।
2. इसकी 10-15 मिनट के लिए मसाज करें।
4. रोजाना 2 बार ऐसा करने से गांठ कम होनी शुरू हो जाती है। विटामिन ई युक्‍त तेल या गरी के तेल के साथ बगलों पर मसाज करें। इससे ब्‍लड सर्कुलेशन अच्‍छा होगा और सूजन नहीं होगी। अगर बगल में रक्‍त का संचार सुचारू रूप से होता है तो गुंथ बनने का कोई चांस ही नहीं होता।

19.5.17

पैरों और टांगों में नसों का ऐंठना फूलना व सूजना के घरेलू उपचार -


पैरों और टांगों में नसों का ऐंठना फूलना व सूजना - टांगों में ऐंठन - नस पर नस का चढ़ जाना - मांस-पेशियाँ में दर्द होना जैसे कि पिंडली में (टांग के पीछे) -
माँस-पेशियों की ऐंठन :
कई लोगों को रात में सोते समय टांगों में एंठन की समस्या होती है। नस पर नस चढ़ जाती है। कई लोगों को टांगों और पिंडलियों में मीठा - 2 दर्द सा भी महसूस होता है। पैरों में दर्द के साथ ही जलन, सुन्न, झनझनाहट या सुई चुभने जैसा एहसास होता है।
ऐसा कई कारणों से होता है। कुछ दिन पहले मैने 'पैरों के तलवों में दर्द - कारण व् निवारण' विषय पर लिखा था।
आज की समस्या - 'ऐंठन' के कारण भी उसी से बहुत सीमा तक मिलते जुलते हैं. मेरे विचार में इसके प्रमुख कारण हैं :
कारण :
- अनियंत्रित मधुमेह (रक्त में शक्कर का स्तर)
- शरीर में जल, रक्तमें सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम स्तर कम होने
- पेशाब ज्यादा होने वाली डाययूरेटिक दवाओं जैसे लेसिक्स सेवन करने के कारण शरीर में जल, खनिज लवण की मात्रा कम होने
- मधुमेह, अधिक शराब पीने से, किसी बिमारी के कारण कमजोरी, कम भोजन या पौष्टिक भोजन ना लेने से, 'Poly-neuropathy' या नसों की कमजोरी।
- कुछ हृदय रोगी के लिये दवायें जो कि 'Beta-blockers' कहलाती हैं, वो भी कई बार इसका कारण होती हैं।
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कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा सेवन करने से.
- अत्यधिक कठोर व्यायाम करने, खेलने, कठोर श्रम करने से.
- एक ही स्थिति में लंबे समय तक पैर मोड़े रखने के कारण और पेशियों की थकान के कारण हो सकता है।
- पैर की धमनियोंकी अंदरूनी सतह में कोलेस्ट्रॉल जमा होने से, इनके संकरे होने (एथ्रीयो स्कोरोसिस) के कारण रक्त प्रवाह कम होने पर,
- पैरों की स्नायुओं के मधुमेह ग्रस्त होने
- अत्यधिक सिगरेट, तंबाकू, शराब का सेवन करने, पोष्क तत्वों की कमी, संक्रमण से।
घरेलू उपचार :
- आराम करें। पैरों को ऊंचाई पर रखें।
- प्रभाव वाले स्थान पर बर्फ की ठंडी सिकाई करे। सिकाई 15 मिनट, दिन में 3-4 बार करे।
- अगर गर्म-ठंडी सिकाई 3 से 5 मिनट की (दोनों तरह की बदल-2 कर) करें तो इस समस्या और दर्द - दोनों से राहत मिलेगी।
- आहिस्ते से ऎंठन वाली पेशियों, तंतुओं पर खिंचाव दें, आहिस्ता से मालिश करें।
- वेरीकोज वेन के लिए पैरों को ऊंचाई पर रखे, पैरों में इलास्टिक पट्टी बांधे जिससे पैरों में खून जमा न हो पाए।
- यदि आप मधुमेह या उच्च रक्तचाप से ग्रसित हैं, तो परहेज, उपचार से नियंत्रण करें।
- शराब, तंबाकू, सिगरेट, नशीले तत्वों का सेवन नहीं करें।
-सही नाप के आरामदायक, मुलायम जूते पहनें।
- अपना वजन घटाएं। रोज सैर पर जाएं या जॉगिंग करें। इससे टांगों की नसें मजबूत होती हैं।
- फाइबर युक्त भोजन करें जैसे चपाती, ब्राउन ब्रेड, सब्जियां व फल। मैदा व पास्ता जैसे रिफाइंड फूड का सेवन न करें।
- लेटते समय अपने पैरों को ऊंचा उठा कर रखें। पैरों के नीचे तकिया रख लें, इस स्थिति में सोना बहुत फायदेमंद रहता है।
भोजन :
- भोजन में नीबू-पानी, नारियल-पानी, फलों - विशेषकर मौसमी, अनार, सेब, पपीता केला आदि शामिल करें।
- सब्जिओं में पालक, टमाटर, सलाद, फलियाँ, आलू, गाजर, चाकुँदर आदि का खूब सेवन करें।
- 2-3 अखरोट की गिरि, 2-5 पिस्ता, 5-10 बादाम की गिरि, 5-10 किशमिश का रोज़ सेवन करें।
- अगर आप मांसाहारी हैं तो मछली का सेवन लाभदायक है।
- चिकित्सक से परामर्श लें :
पैरों में दर्द के साथ सूजन, लाली हो और बुखार आ रहा हो, पैर नीला या काला हो गया हो या फिर पैर ठंडा या पीला पड़ गया हो और घरेलू उपचार से राहत नहीं मिल पा रही हो, तो ऎसी स्थिति में चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।
- पैरों के तलवों पर एक्यूप्रेशर रोलर करनें से दर्द से राहत मिलती है। इस क्रिया में पैरों को रोलर पर रखकर धीरे-धीरे घुमाएं। यह क्रिया दिन में 5-7 बार करनी चाहिए। इसे दो मिनट तक करना पर्याप्त रहता है। रोलर करने से पहले तलवों पर हल्का पाउडर लगाएं। इससे एक्यूप्रेशर आसानी से होगा।
मालिश : पैरों को दबाने या मालिश करने से आराम मिलता है। मालिश करते समय दोनों पैरों के तलवों की ओर अंगूठे के बिल्कुल नीचे पड़ने वाले बिंदु पर दबाव दें। अब पैरों के ऊपर छोटी उंगली के नीचे पड़ने वाले तीन बिंदुओं पर दबाव दें। पैरों के नीचे एड़ी पर पड़ने वाले तीन मास्टर बिंदुओं पर प्रेशर दें।
मालिश के लिए कोई भी तेल काम में लिया जा सकता है। दिन में दो-तीन बार 15-15 सेकंड तक प्रेशर करें और मालिश करें। 2-3 सप्ताह में आपको आराम मिलने लगेगा।
बचाव :
खून में ग्लूकोस की मात्रापर नियंत्रण रखें - यानी की मधुमेह को नियंत्रित रखें. मध्यम
- तीव्रता के व्यायाम करें, जिससे पेशियां, हडि्डयां मजबूत हों और जोड़ लचीले।
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संतुलित भोजन का सेवन करें।
- भोजन में वसा का सेवन कम करें।
- खेलने, व्यायाम करने के पहले और बाद में हल्के व्यायाम (वार्मअप, कूल डाउन) करें।
- प्रचुर मात्रा में पानी पीएं, विशेष रूप से व्यायाम करने, खेलने से पूर्व, इनके दौरान और बाद में।
- लंबी यात्रा के दौरान लगातार एक ही मुद्रा में बैठे न रहे। नियमित अंतराल में सीट से खड़े होकर टहलें, शरीर को खिंचाव दें।
- मालिश और रिलेक्सेशन व्यायामों के जरिए मांसपेशियों के खिंचाव व दर्द को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
आयुर्वेदिक औषधियां, होमियोपैथिक औषधियां, फिजियोथेरेपी, एक्यूप्रेशर व व्यायाम आदि सुविधानुसार कुछ भी अपनाया जा सकता है।
आयुर्वेदिक औषधियां :
- अश्वगंधापाक 10-10 ग्राम दूध के साथ सुबह-शाम। अगर ना मिले तो अश्वगंधा का चूर्ण भी लाभदायक है।
- सुबह-शाम ही गुनगुने दूध के साथ किसी भी अच्छी कम्पनी का च्यवनप्राश लें।
- वृहतवात चिंतामणि की एक गोली दिन में किसी भी समय दूध की मलाई के साथ लें।
- महानारायण तेल की मालिश करें व गर्म पानी की बोतल से सिकाई करें।
हड्डी दौर्बल्य के कारण होने वाला दर्द :
- मुक्ताशक्ति भस्म 500 मि.ग्रा. में पर्याप्त मलाई के साथ सुबह-शाम, गर्म दूध के साथ लें।
- इसी के साथ महायोग राज गुग्गुल की 2-2 गोली सुबह-शाम गर्म दूध के साथ लें।
-बलारिष्ट नामक औषधि की 30 मि.ली. खुराक समभाग ताजा जल के साथ सुबह-शाम लेनी चाहिए।
- इसके अलावा सुबह-शाम दो-दो गोली लाक्षादि गुग्गुल की एक चम्मच कैस्टर ऑयल से लेनी चाहिए।
फिजियोथेरेपी :
दर्द मिटाने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट हल्के हाथों से मालिश करता है और कशेरुकाओं को उनकी सही जगह पर बैठा देता है। यह उपचार चिकित्सकीय परामर्श के बाद ही योग्य व कुशल फिजियोथेरेपिस्ट से कराना चाहिए।
एक्यूप्रेशर व एक्यूपंक्चर :
पारंगत व्यक्ति से ही यह उपचार कराना चाहिए। कुशल हाथों के द्वारा रोगी के दर्द में काफी आराम मिल सकता है।
होमियोपौथिक उपचार :
लक्षणों की समानता के आधार पर मुख्यरूप से निम्न औषधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
चेलीडोनियम: गर्दन में दर्द, कठोरता, घुमाने में दर्द, दाएं कंधे की हड्डी (स्केपुला) पर अंदर एवं नीचे की तरफ लगातार दर्द रहने पर 30 शक्ति औषधि लेनी चाहिए।
जिंकम मेट : कमर दर्द, छूना भी पीड़ादायक, कंधों पर तनाव, रीढ़ की हड्डी में चिड़चिड़ाहट, आखिरी डॉरसल अथवा रीढ़ की प्रथम लम्बर हड्डी में दर्द, गुम चोट जैसा दर्द, एक जगह बैठे रहने पर दर्द, अकड़न, कंधों में टूटन-ऐंठन आदि लक्षण मिलने पर उक्त औषधि 30 शक्ति में दिन में तीन बार 3-3 बूंद लेनी चाहिए। इस औषधि से रोगी को टट्टी-पेशाब के बाद राहत मिलती है।
स्त्रियों को सफेद पानी (श्वेत प्रदर) के साथ कमर दर्द व चिड़चिड़ाहट पर सीपिया 30 तथा एलुमिना 30 शक्ति में देनी चाहिए।
अत्यधिक मैथुन के बाद कमर दर्द रहने पर एग्नस कैस्टस एवं एसिडफॉस औषधियां 30 शक्ति में लेना हितकर रहता है।
यदि चलने-फिरने पर दर्द बढ़ने लगे एवं दबाने पर तथा दर्द वाली सतह पर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया 30 शक्ति में, दिन में तीन बार, एक हफ्ते तक लेनी चाहिए।
कालीकार्ब औषधि के रोगी में ब्रायोनिया से विपरीत लक्षण मिलते हैं। अर्थात् रोगी को चलने-फिरने से आराम मिलता है एवं बाईं तरफ अथवा दर्द वाली सतह पर लेटने से परेशानी बढ़ जाती है। ऐसे में कालीकार्ब औषधि 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
व्यायाम :
- कैटरपिलर वॉक बेहद लाभकारी व्यायाम है जिसमें मशीनों की जरूरत नहीं होती। इसके लिए जमीन पर पुश-अप पोजीशन में आइए। दोनों हाथ जमीन पर और पैरों का वजन पंजों पर। पहले अपना दायां पैर आगे लेकर आएं, उसके बाद बायां पैर आगे लाएं। याद रहे हथेलियां जमीन पर रहें। इसके बाद हथेलियों के सहारे धीरे-धीरे आगे चलें और बाद में पैरों को भी आगे ले जाएं। फिर पीछे की तरफ मुड़े और दोबारा इस प्रक्रिया को करें। धीरे -धीरे इसको करें और कमरे या जगह के हिसाब से यह एक्सरसाइज करें।
- कॉफ रेजिज एक्सरसाइज ऐड़ी और पंजे के द्वारा की जाती है। इस एक्ससाइज को करने के लिए एक प्लेटफार्म की जरूरत होती है जिस पर आप पंजों के बल कॉफ रेजिज करने की सही पोजीशन में खड़ी हो सकें। यह संभव ना हो तो कुछ बार सीधे खड़े होकर पंजों के बाल खड़े हों और कुछ देर बाद वापिस सामान्य स्थिति में आ जायें। ऐसा 5-10 सेकेंड तक 10 बार तक करने का प्रयास करें।
- किसी कुर्सी पर बैठकर पेहले एक टांग को घुटने से सीधा करें। उसे जमीन के समानान्तर लाने का प्रयास करें, नहीं तो जितना आराम से कर सकते हैं-करें. टांग को 5-10 सेकेंड तक रोकें और धीरे-2 वापिस नीचे ले आयें। ऐसा 10 बार करें। फिर दूसरी टांग से 10 बार करें। 1-2 मिनट आराम करके दोनों टांगों के साथ ऐसा 10 बार करें. इस से आपको घुटनों के दर्द में भी आराम मिलेगा।
- भूमि पर या किसी भी आरामदायक सख्त आसान पर बैठकर टांगें फैला लें. अब एक पैर को एडी और पंजों से बाहिर की ओर फेलाने / खींचने का प्रयास करें (वैसे ही - हाथ से पकड़े बिना). 5-10 सेकेंड बाद ढीला छोड़ दें. दोनों पैरों से 10-10 बार करें। इस से आप को इस समस्या, घुटनों और पैरों के दर्द में भी राहत मिलेगी।
तैरना :
तैरना एक बेहद फायदेमंद व्यायाम साबित हुआ है। तैरने से हमारे पेट, पीठ, बांह, व टांगों की मांसपेशियां मजबूत बनती हैं। पानी हमारे शरीर के गुरुत्वाकर्षी खिंचाव को कम कर देता है, जिसके चलते तैरते समय पीठ पर किसी तरह का तनाव या बोझ नहीं पड़ता। यह सावधानी जरूर रखें कि कुछ निश्चित स्ट्रोक के बाद अपना चेहरा पानी के भीतर जरूर कर लें। हमेशा सिर ऊपर करके तैरने से रीढ़ के अस्थिबंधों में कुछ ज्यादा ही खिंचाव पैदा हो जाता है। इस कारण पीठ दर्द बढ़ भी सकता है।
योग आसन :
उत्तान पादासन :
इस आसन को स्त्री पुरुष समान रूप से कर सकते हैं। छह सात वर्ष के बालक-बालिकाएं भी इसे कर सकते हैं। यह बहुत आसान आसन है एवं अधिक लाभदायक है। करने की शर्त यह कि आपको पेट और कमर में किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग न हो। यदि ऐसा है तो किसी योग- चिकित्सक से पूछकर करें।


विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनों हथेलियों को जांघों के साथ भूमि पर स्पर्श करने दें। दोनों पैरों के घुटनों, एड़ियों और अंगूठों को आपस में सटाए रखें और टांगें तानकर रखें।
अब श्वास भरते हुए दोनों पैरों को मिलाते हुए धीमी गति से भूमि से करीब डेढ़ फुट ऊपर उठाएं अर्थात करीब 45 डिग्री कोण बनने तक ऊंचे उठाकर रखें। फिर श्वास जितनी देर आसानी से रोक सकें उतनी देर तक पैर ऊपर रखें।
फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पांव नीचे लाकर बहुत धीरे से भूमि पर रख दें और शरीर को ढीला छोड़कर शवासन करें।
आसन अवधि : इस आसन का प्रात: और संध्या को खाली पेट यथाशक्ति अभ्यास करें। जब आप श्वास को छाती में एक मिनट से दो तीन मिनट तक रोकने का अभ्यास कर लेंगे तब आपका आसन सिद्ध हो जाएगा।
- रोज सर्वागासन करें।

13.5.17

सीने में दर्द के लिए घरेलू नुस्ख़े (Home Remedies For Chest Pain)



  कुछ लोग छाती में होने वाले दर्द के कारण चिंता करने लगते हैं तथा ऐसा मानते हैं कि यह दर्द हार्ट (हृदय) से संबंधित किसी समस्या के कारण है। परंतु यह एक अस्थायी दर्द होता है तथा तब तक रहता है जब तक पेट की गैस निकल नहीं जाती। सीने में दर्द हमेशा हृदय संबंधी समस्‍याओं के कारण नहीं होता है। इसके लिए कई अन्‍य कारण भी हो सकते हैं। हालांकि, सीने में दर्द महसूस होने पर हमेशा चिकित्‍सक से सलाह लेने के लिए कहा जाता है ताकी सीने में दर्द के सही कारणों के बारे में जानकारी हासिल की जा सकें। आमतौर पर सीने में होने वाले इस दर्द को 'एंजाइना' कहा जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में एंजाइना पेक्टोरिस कहा जाता है। कोरोनरी डिजीज के चलते दिल तक पहुंचने वाले रक्त की मात्रा कम होने पर एंजाइना की समस्या होती है। सीने में दर्द की कभी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। एक बार यह जानने के बाद कि दर्द के कारणों में दिल संबंधी गंभीर समस्‍या शामिल नहीं है।
जब सीने में हो दर्द तो अपनायें ये घरेलू उपाय
 
लहसुन
लहसुन समग्र स्‍वास्‍थ्‍य के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है, विशेष रूप से हृदय समस्‍याओं के इलाज के लिए तो लहसुन बहुत ही फायदेमंद होता है। लहसुन में पाये जाने वाले कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, थियामिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन और विटामिन सी के कारण इसे विटामिन और मिनरल का भंडार कहा जाता है। इसके अलावा इसमें आयोडीन, सल्‍फर और क्‍लोरीन भी पाया जाता है। यह खांसी, अस्‍थमा और कफ आदि के कारण होने वाले सीने में दर्द को दूर करने में मदद करता है। लहसुन की केवल एक कली को नियमित रूप से लेने से कोलेस्‍ट्रॉल के स्‍तर को कम और धमनियों की दीवारों पर पट्टिका का निर्माण रोका जा सकता है, जो एंजाइना या सीने में दर्द का एक प्रमुख कारण है। 
पेट की गैस को कम करने के तरीके 
अपूर्ण पाचन, जल्दी जल्दी खाना खाते समय खाने के साथ हवा निगलने, कब्ज़, तैलीय और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाने, अधिक फाइबर और स्टार्च युक्त आहार लेने, खाद्य पदार्थों की एलर्जी आदि के कारण आँतों में गैस बन सकती है। कुछ पेय पदार्थ जैसे सोडा युक्त ड्रिंक, सॉफ्ट ड्रिंक या बीयर के कारण भी यह समस्या हो सकती है। गैस निकलना, पेट में दर्द, छाती में दर्द, पेट में सूजन और भूख न लगना छाती में दर्द के लक्षण हैं।
अदरक 
अदरक की जड़ विभिन्न स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के इलाज के लिए बहुत पुराना उपाय है। यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं जैसे एसिडिटी, सर्दी और फ्लू और सूजन और गर्भावस्‍था के दौरान होने वाली उल्‍टी और मतली के लिए बहुत ही उपयोगी उपाय है। जब भी आप सीने में दर्द का अनुभव करें तो सूजन को कम करने और खांसी से राहत पाने के लिए अदरक की जड़ की चाय का सेवन करें। इसके अलावा इससे बनी चाय हार्टबर्न के कारण होने वाले सीने में दर्द को दूर करने में भी मददगार होती है।
 
इलायची और जीरा 
गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द के लिए यह एक उत्तम घरेलू उपचार है। ये कार्मिनटिव (वातहर) की तरह कार्य करते हैं। ये पेट से गैस निकालते हैं तथा इस फंसी हुई गैस के कारण छाती और पेट में होने वाले दर्द से आराम दिलाते हैं। आप इलायची को पानी में कुछ देर उबालकर इलायची की चाय पी सकते हैं। ये पाचन में भी सहायक होते हैं तथा गैस बनने से भी रोकते हैं।
हल्दी
एक मसाले के रूप में हल्दी का इस्‍तेमाल व्यापक रूप से एशियाई व्यंजनों में किया जाता है और जड़ी बूटी के रूप में इसका इस्‍तेमाल आयुर्वेद और चीनी दवाओं में एंटी-इंफ्लेमेंटरी रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। हल्दी में पाये जाने वाले करक्यूमिन नामक तत्‍व के कारण इसका इस्‍तेमाल पेट फूलना, घाव, सीने में दर्द आदि जैसे विभिन्न रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों से दिल की रक्षा के लिए करक्यूमिन बहुत प्रभावी है। यह तत्‍व कोलेस्ट्रॉल के ऑक्सीकरण रोकने में मदद करता है जो रक्‍तवाहिकाओं को नुकसान पहुंचाकर धमनियों की दीवारों पर प्‍लॉक को मजबूत बनाता है।
तुलसी (Holy Basil)
तुलसी में सिर्फ एंटी बैक्टीरियल गुण ही नहीं बल्कि एंटी इंफ्लामेट्री गुण भी होते हैं। इसके अलावा तुलसी में ऐसे कई कंपाउड पाए जाते हैं जो दिल के सेहत के लिए भी गुणकारी है। तुलसी में Eugenol पाया जाता है जो दिल के सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। तुलसी के पत्ते लोग चबा कर खाते हैं और कई लोग चाय और काढ़ा बना कर पीते हैं। अगर छाती में दर्द है तो तुलसी-अदरक का काढ़ा बना कर उसमें शहद की बूंदे डाल कर पी लीजिए काफी फायदा करेगा।


गुड़हल
हिबिस्कस में बहुतायत में एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी, विशेष रूप से फ्लेवोनॉयड मुक्त कणों को बेअसर कर पूरे स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने में करता हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट धमनियों में वसा के संचय को कम कर हृदय की समस्याओं और सीने में दर्द को रोकने में मदद करता है। साथ ही इस जड़ी बूटी में भरपूर मात्रा में पाया जाने वाला विटामिन सी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं विशेष रूप से अगर आपको सर्दी और फ्लू से ग्रस्त होने पर खांसी और सीने में तेज दर्द होता है। हिबिस्कस चाय खांसी, सीने में दर्द, गले में खराश और अन्य सांस की समस्याओं को दूर करने में मददगार होती हैं।
*गर्म तरल पदार्थ पीना गर्म तरल पदार्थ जैसे चाय या कॉफ़ी पेट और छाती से प्राकृतिक तरीके से गैस निकालने में सहायक होते हैं। गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द से आराम पाने के लिए यह एक प्रभावी उपचार है।
*पपीता गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द के लिए यह एक सर्वोत्तम उपचार हैं। यह पेट में गैस बनने से भी रोकता है। अत: यह पाचन के लिए भी अच्छा होता है। यदि आप गैस की समस्या से ग्रस्त हैं तो प्रतिदिन पपीता खाने की आदत डालिए।
*सॉफ्ट ड्रिंक्स न पीयें जैसा कि इनके नाम "कार्बोनेटेड ड्रिंक्स" से ही पता चलता है कि इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड गैस होती है। ये पेट और छाती में गैस की समस्या को बढ़ा सकते हैं। अत: इनके वजह से गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द की संभावना बढ़ जाती है।
*व्यायाम आपको ऐसे व्यायाम करने चाहिए जो पाचन में सहायक हों। यदि आपकी जीवनशैली निष्क्रिय या गति रहित है तो पाचन अच्छे से नहीं होगा जिसके कारण गैस बन सकती है। अत: हमेशा कोई हल्की फुल्की कसरत करें।
*बेकिंग सोड़ा गुनगुने पानी में थोडा सा बेकिंग सोडा मिलाकर पीयें। यह पेट से गैस निकाल देता है और दर्द से आराम मिलता है।
*दूध से बने पदार्थों का सेवन न करें कुछ लोगों को दूध से बने पदार्थ सहन नहीं होते। इन लोगों को दूध से बने पदार्थ खाने के बाद अपचन और गैस की समस्या हो जाती है। आप वे खाद्य पदार्थ जानते हैं जिनके कारण गैस होती है और उनका उपयोग टालें।

8.5.17

गांठ किसी भी प्रकार की हो ,करें ये घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


    शरीर के किसी भी हिस्से में उठने वाली कोई भी गठान या रसौली एक असामान्य लक्षण है जिसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। ये गठानें पस या टीबी से लेकर कैंसर तक किसी भी बीमारी की सूचक हो सकती हैं। गठान अथवा ठीक नहीं होने वाला छाला व असामान्य आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि शरीर में उठने वाली हर गठान कैंसर ही हो। अधिकांशतः कैंसर रहित गठानें किसी उपचार योग्य साधारण बीमारी की वजह से ही होती हैं लेकिन फिर भी इस बारे में सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार की किसी भी गठान की जाँच अत्यंत आवश्यक है ताकि समय रहते निदान और इलाज शुरू हो सके।
आपके शरीर मे कहीं पर भी किसी भी किस्म की गांठ हो। उसके लिए है ये चिकित्सा चाहे किसी भी कारण से हो सफल जरूर होती है। कैंसर मे भी लाभदायक है।
 

आप ये दो चीज पंसारी या आयुर्वेद दवा की दुकान से ले ले:-
कचनार की छाल
गोरखमुंडी
वैसे यह दोनों जड़ी बूटी बेचने वाले से मिल जाती हैं पर यदि कचनार की छाल ताजी ले तो अधिक लाभदायक है। कचनार (Bauhinia purpurea) का पेड़ हर जगह आसानी से मिल जाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान है - सिरे पर से काटा हुआ पत्ता । इसकी शाखा की छाल ले। तने की न ले। उस शाखा (टहनी) की छाल ले जो 1 इंच से 2 इंच तक मोटी हो । बहुत पतली या मोटी टहनी की छाल न ले। गोरखमुंडी का पौधा आसानी से नहीं मिलता इसलिए इसे जड़ी बूटी बेचने वाले से खरीदे ।
कैसे प्रयोग करे :-
कचनार की ताजी छाल 25-30 ग्राम (सुखी छाल 15 ग्राम ) को मोटा मोटा कूट ले। 1 गिलास पानी मे उबाले। जब 2 मिनट उबल जाए तब इसमे 1 चम्मच गोरखमुंडी (मोटी कुटी या पीसी हुई ) डाले। इसे 1 मिनट तक उबलने दे। छान ले। हल्का गरम रह जाए तब पी ले। ध्यान दे यह कड़वा है परंतु चमत्कारी है। गांठ कैसी ही हो, प्रोस्टेट बढ़ी हुई हो, जांघ के पास की गांठ हो, काँख की गांठ हो गले के बाहर की गांठ हो , गर्भाशय की गांठ हो, स्त्री पुरुष के स्तनो मे गांठ हो या टॉन्सिल हो, गले मे थायराइड ग्लैण्ड बढ़ गई हो (Goiter) या LIPOMA (फैट की गांठ ) हो लाभ जरूर करती है। कभी भी असफल नहीं होती। अधिक लाभ के लिए दिन मे 2 बार ले। लंबे समय तक लेने से ही लाभ होगा। 20-25 दिन तक कोई लाभ नहीं होगा निराश होकर बीच मे न छोड़े।

6.5.17

मूत्र रोगों के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार / Domestic Ayurvedic treatment of urinary diseases


मूत्र रोग के उपचार के लिए सबसे पहले लक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए . उसी के आधार पर सही कारण का पता चल पायेगा . इसके बाद ही उपचार करना चाहिए . बच्चों में यह बहुत कम और बड़ों में अधिकाँश होता है . वृद्धावस्था में इसकी संभावना बढ़ जाती है . अगर सुरुआत में इसके लक्षणों पर ध्यान न दिया जाए तो सामान्य संक्रमण से लेकर पुरुष ग्रंथि तक में कैंसर की सम्भावना बन सकती है . महिलाओं में मूत्र रोग संक्रमण गर्भाशय तक पहुँच सकता है . इसके बहुत घातक परिणाम हो सकते हैं जीवन दूभर हो सकता है . इस लेख में हम लक्षणों से सुरुआत कर कारण और मूत्र रोग के घरेलु एवं आयुर्वेदिक उपचार पर बात करेंगे .
मूत्र रोग संक्रमण के सामान्य लक्षण
पेशाब का बूँद बूँद कर होना और खुलकर न होना .
कमर और उसके आस पास और आगे पीछे दर्द होना .
पेशाब के साथ,पहले या बाद में खून का आना , इससे पेशाब हलके लाल या काले रंग की हो जाती है .
अत्यधिक दुर्गन्ध युक्त पेशाब होना
थकान के साथ बुखार आना .
भूंख न लगना और कब्ज महसूस होना .
मूत्र त्यागते समय मूत्र मार्ग में पीड़ा और जलन होना .
बार बार प्यास लगना .
थोड़ी थोड़ी देर पर पेशाब लगना .
गर्भवती स्त्रियों में मूत्राशय दब जाने से प्रदाह हो जाना .

 
मूत्र रोग के विभिन्न कारण-
बच्चों में अधिकतर पेशाब के बार बार होने और खुलकर न होने की समस्या आती है . ऐसा मीठा (शक्कर ) ज्यादा खा लेने और पर्याप्त पानी न पीने से होता है . ऐसा बड़ों में भी संभव है .
युवावस्था में सही समय पर मूत्र त्याग न करना और रोके रखना मूत्राशय और मूत्र नली में संक्रमण का कारण बन सकता है . जैसे आप किसी जरुरी मीटिंग में हों तो पेशाब लगने पर रोक लेते हैं और मीटिंग के ख़तम होने का इन्तजार करते हैं .
युवा लड़कियों और महिलाओं में घर से बहार होने पर शर्म और संकोचवश सही समय पर मूत्र त्याग न करना .
मुत्रेंद्रिय की साफ़ सफाई का ध्यान न रखना .
मधुमेह ( डायबिटीज ) रोगियों के मूत्र रोग बहुत जल्द हो जाते हैं .
सम्भोग के समय पेट पर अत्यधिक दबाव पड़ने से बैक्टीरिया मूत्राशय में आ सकते हैं , ऐसा महिलाओं में अधिकार होता है .
आनुवांशिक क्षय रोग होना , चिंता एवं तनाव होना , हिस्टीरिया (महिलाओं में ) , शराब पीना , सर्दी लगना , लीवर की समस्याएँ भी इसका कारण हो सकती है .
प्राप्त लक्षणों के आधार पर इसका उपचार किया जा सकता है और कारणों को ध्यान में रखकर सावधानियां / परहेज भी ध्यान में रखने चाहिए . इसके घरेलु और आयुर्वेदिक उपचार आगे दिए गए हैं .
मूत्र रोगों के  उपचार-
एक लीटर पानी में ४० ग्राम प्याज के टुकड़े काट कर मिला लें . इसे तब तक उबालें तब तक मिश्रण तिहाई रह जाए . इसे छान लें और शहद मिलाकर दिन में ३ बार पिलायें . इससे पेशाब खुलकर और बिना रुकावट आने लगता है . अगर पेशाब आना रुक गया है तो फिर से आने लगता है .
*२०० मिली खीरे या ककड़ी के रस में एक बड़ा चम्मच नीम्बू का रस और एक चम्मच शहद मिला कर पीने से मूत्र रोग में आराम मिलता है . इसे हर ३ घंटे के बाद लें .


*गर्म दूध में गुड मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है . इसे दिन में २ बार एक एक गिलास लें .
*अगर दर्द हो रहा हो तो हर १५ मिनट पर पानी या तरल पदार्थ दें .
*गुर्दे की खराबी की वजह से अगर पेशाब न बन रहा हो तो ६० ग्राम मूली का रस दे , इससे जलन और दर्द में भी रहत मिलती है .
*पानी खूब पिए जिससे शरीर में पानी की कमी न होने पाए . सामान्य रूप से दुर्गन्ध युक्त मूत्र , पीला मूत्र और जलन इससे काबू में रहते हैं . सर्दियों में ८ और गर्मियों में १६ गिलास पानी जरुर पियें .
*मूली के पत्तों का रस १०० मिली की मात्रा में दिन में ३ बार देने पर मूत्र रोग में बहुत लाभ होता है .
*पेशाब रुक रुक कर आ रहा हो तो शलगम और कच्ची मूली काट कर खाएं . रस भी पी सकते हैं .
*आधा गिलास गाजर के रस में आधा गिलास पानी मिलाकर दिन में दो बार पीने से पेशाब की जलन में राहत मिलती है .
*दिन में २ बार ५० ग्राम कच्चा नारियल खाने से मूत्र साफ़ होता है .
*आधा गिलास मट्ठा लें , उसमें आधा गिलास जौ का माड़ मिलाएं . इस मिश्रण में ५ मिली नीम्बू का रस मिलाकर पीने से मूत्र के रास्ते के सभी रोग नष्ट होते हैं .
 
*केले के तने का रस ४ चम्मच और २ चम्मच घी मिलाकर दिन में २ बार पीने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है . यह मूत्र रुक जाने पर बेहतरीन उपाय है .
*नीबू के बीजों को पीसकर नाभि के ऊपर रखकर ठंडा पानी डालने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*नीम्बू अपनी अम्लीय और क्षारीय दोनों प्रकृति के कारण मूत्राशय में उपस्थित जीवाणुओं को ख़तम कर देता है . नीम्बू का रस पीने से रक्तयुक्त पेशाब में लाभ होता है .
*जीरा और चीनी सामान मात्रा में लेकर पीस लें . इसे २ चम्मच दिन में ३ बार लेने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*१२५ मिली पलक के रस में नारियल का पानी मिलाकर पीने से पेशाब की जलन में लाभ होता है .
ताज़ी भिन्डी को बारीक काटकर दो गुने पानी में उबाल लें . तिहाई रह जाने पर छान लें . यह काढ़ा दिन में दो बार पीने पर प्रदाह में होने वाले पेट दर्द में लाभकारी है .
*आधा गिलास चावल के माड़ में स्वादानुसार चीनी मिलकर दो बार पीने पर रुका पेशाब खुलकर आने लगता है 
*पेशाब के समय दर्द हो रहा है और रक्त भी आ रहा है तो सोंठ को पीस – छान कर दूध में मिसरी के साथ पिलाने पर लाभ होता है .
*सौंफ को पानी के साथ उबालकर ठंडा कर लें . इसे दिन में ३ बार थोडा थोडा पीने से मूत्र रोग में रहत मिलती है .
*छोटी इलायची को पीसकर दूध के साथ लेने से मूत्र जी जलन में लाभ के साथ मूत्र खुलकर आता है .
*पेशाब में खून आना , दर्द , बेचैनी और जलन में धनियाँ बहुत गुणकारी है . रात में खाली हांडी में आधा किलो उबलता पानी डालकर उसमें ३० ग्राम अधकचरा कुटा धनियाँ डाल दें . सुबह इसे मसलकर छान लें और इसमें ३० ग्राम बताशे डाल कर मिला दें . इसके पांच हिस्से करके दिन में पांच बार पिलायें .
*पेशाब बार बार होने पर ३ दाना मुनक्का, २ दाना पिस्ता और ५ दाना काली मिर्च कुचलकर सुबह शाम खाने से इस समस्या से छुटकारा मिलता है .


*सेब खाने से रात में बार बार पेशाब जाने से आराम मिलता है .
*मसूर की दाल खाने से बार बार पेशाब में आराम मिलता है .
*२५ ग्राम अजवाइन , ५० ग्राम काला तिल और १०० ग्राम गुड मिलाकर इसे 8 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम लेने से पेशाब में जलन और बहुमूत्र जैसे रोग ठीक हो जाते हैं .
*बरगद के पेड़ के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से पेशाब में जलन और रूकावट से छुटकारा मिलता है .
*सात दिनों तक पके केले का नाश्ता करें . इससे पेशाब खुलकर आएगा और मूत्र विकार दूर होंगे .
*सुबह शाम तिल के लड्डू खाने से बार बार पेशाब की समस्या से छुटकारा मिलता है .
*चमेली के पत्तों का रस पीने से मूत्र विकार दूर होता है .
*बिस्तर पर पेशाब करने की आदत पड़ने पर रोज छुहारा खाना चाहिए .
*सौंफ के रस में थोड़ी हींग डालकर पीने से पेशाब की रूकावट दूर होती है .
*आधा कप नाशपाती का रस रोजाना पीने से कुछ ही दिनों में सभी मूत्र रोग दूर हो जाते हैं .
*१०० ग्राम पीसी हल्दी, २५० ग्राम काले टिल और १०० ग्राम पुराने गुड को कूटकर और तवे पर सुखा भून लें . इसे रोजाना एक चम्मच सुबह के समय पानी के साथ लेने पर सभी मूत्र रोग दूर हो जाते हैं .
*फालसे खाने और उसका शरबत पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है .
*अन्नानास का रस व शरबत पीने से पेशाब की जलन की समस्या से छुटकारा मिलता है .
*दालचीनी के सेवन से रुका हुआ पेशाब खुल जाता है और पेशाब में पस आना बंद हो जाता है . इसके लिए तीन बार आधा चम्मच दालचीनी पावडर पानी के साथ फांकना लाभकारी होता है .
*२ चम्मच दालचीनी पावडर और १ चम्मच शहद को हलके गर्म पानी में घोल लें . इसके सेवन से मूत्राशय के रोग नष्ट हो जाते हैं .
*जामुन की गुठली का चूर्ण रोजाना १-२ चम्मच ठन्डे पानी से लेने पर पेशाब में सुगर जाना बंद हो जाता है .
*खीरे या ककड़ी के बीजों के साथ काली मिर्च मिलाकर पीने से रुका हुआ पेशाब फिर से आने लगता है .
*पेशाब में जलन होने पर ठन्डे पानी में नीम्बू का रस मिलकर पीने से लाभ होता है .
*हरी दूब की जड़ का काढ़ा पीने से पेशाब के समय होने वाले कष्ट और जलन से छुटकारा मिलता है .
*हरी दूब को मिसरी के साथ पीसकर और छानकर पीने से पेशाब में खून आना बंद हो जाता है .
*पीसी इलायची शहद के साथ खाने पर पेशाब करते समय होने वाला दर्द और जलन दूर होता है . छोटी पीसी इलायची को नारियल के पानी , निर्मली और शक्कर मिलकर पीने से जल्दी लाभ होता है .
*बड़ी इलायची और शोरे को १० -१० ग्राम की मात्र में पीसकर ४ – ४ ग्राम दूध के साथ सुबह शाम खाने से पेशाब की जलन से छुटकारा मिलता है .
*तेजपत्ता का चूरन खाने से मूत्र में सुगर का जाना बंद हो जाता है और खून में सुगर की मात्र कम हो जाती है .
*बबूल की कच्ची फली को चाय में सुखा लें . उसके बाद घी में तलकर चूर्ण बना लें . इस चूर्ण को ३ -३ ग्राम की मात्रा में लेने पर बहुमूत्र में लाभ मिलता है .
*तरबूज के बीचों को गर्म पानी में पीसकर और छानकर पीने से पेशाब करने में कष्ट या जलन से छुटकारा मिलता है और पथरी में भी लाभ होता है ..
*अंगूर के रस में शहद मिलाकर पीने से बार बार पेशाब आना कम होता है .
*गन्ने का रस रोज पीने से पेशाब की रूकावट दूर होती है .
*सीताफल की जड़ को पानी में घिसकर पीने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*एक पका केला खाकर आंवले के रस में चीनी मिलाकर पीने से पेशाब आने लगता है .
*१० ग्राम धनिये को रात में पानी में भिगोकर और छानकर पीने से पेशाब की पेशाब की जलन दूर होती है .
*हरे धनिये के पत्तों के रस में २ चम्मच रस मिलकर पीने से मूत्र रोग में लाभ होता है .



25.4.17

गर्मी के मौसम मे क्या खाएं

   बदलती ऋतुओं के अनुसार शरीर में स्वाभाविक रासायनिक परिवर्तन होते हैं और इस परिवर्तन में ऋतूचर्यानुसार खाध्य पदार्थों का सेवन किया जाए तो वात-पित्त-कफ के उभार से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है| यहाँ मैं गर्मी की ऋतू में अच्छी सेहत के लिए सेहतमंद दिन चर्या की बात करूँगा-
   
गर्मियां में बहुत जरूरी है कि हम अपने खानपान का पूरा ध्यान रखें. खासतौर पर ऐसा खान-पान होना चाहिए तो कि शरीर को ठंडा करे.खुबानी यानी एप्रीकॉट में बीटा-कैराटीन होता है, जिसमें एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये कैंसर और हृदय रोगों की रोकथाम के लिए बहुत अच्छा है. इसे त्वचा के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है, क्योंकि इससे त्वचा ऑयली नहीं होती.

  अल सुबह उठते ही २-३ गिलास पानी पीना चाहिए| इसके बाद शौच,दन्त सफाई,आसान और प्राणायाम नियमित रूप से करें| अब रात को पानी भिगोये हुए ११ बादाम को छिलके उतारकर पीसकर एक गिलास दूध के साथ पीएं| इसके नियमित प्रयोग से शारीरिक तंदुरुस्ती मिलती है और आंतरिक उष्मा शांत होती है| गर्मी के मौसम में तले भुने,गरिष्ठ और ज्यादा मसालेदार पदार्थों की बजाय फल फ्रूट ,हरी सब्जियों के सलाद और जूस का ज्यादा इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद रहता है| इससे गर्मी की वजह से पसीना होने से होने वाली पानी कमी का पुनर्भरण भी होता रहता है|
   गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने के लिए छाछ बहुत ही अच्छी होती है. इसमें लैक्ट‍िक एसिड पाया जाता है, जो कि स्कीम मिल्क से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है. ये शरीर में चुस्ती लाता है. इसे खाने के बाद लिया जाता है, क्योंकि ये पाचन में बहुत मददगार है. इसमें अध‍ि‍क मात्रा में कैल्श्‍िायम, पोटैश‍ियम और जिंक होता है
   *आम सबको बहुत पसंद आता है और गर्मियों में खूब मिलता है. इसे भरपूर मात्रा में विटामिन सी और आयरन पाया जाता है. ये गर्भवती महिलाओं के लिए भी बहुत अच्छा है.

  
 *ग्रीष्म ऋतू में बाजारू चीजें खाने से बचने की सलाह दी जाती है| इस मौसम में शारीरिक कमजोरी        ,अपच,दाद,पेचिश,सीने में जलन.खूनी बवासीर ,मुहं की बदबू आदि रोगों से बचने का सरल उपचार भी लिख देता हूँ| खाली पेट,नींबू का रस आंवले का रस और हरे धनिये का रस मिश्री मिलाकर पीने से कई रोगों से बचाव हो सकता है| दोपहर और सांयकालीन भोजन में चावल के साथ अरहर,मूंग,उडद की दाल और हरी पत्तीदार सब्जियों का समावेश करें| छाछ व् दही का सेवन करना हितकारी है| रात का भोजन ना करें तो ज्यादा अच्छा|
तरबूज गर्मियों में शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है. गर्मियों के मौसम में इसका अध‍िक सेवन शरीर के लिए फायदेमंद होता है. इसमें सोड‍ियम, पोटैश‍ियम और विटामिन बी भी पाया जाता है.
कॉर्न यानी भुट्टे में विटामिन सी, मैगनेश‍ियम, फॉसफोरस और फोलेट पाया जाता है. इसमें फाइबर भी होता है, जो कि पाचन के लिए बहुत अच्छा होता है.
गर्मी में घर से बाहर निकलने के पाहिले २ गिलास पानी जरूर पी लेना चाहिए| टमाटर,तरबूज,खरबूज,खीरा ककड़ी,गन्ने का रस और प्याज का उपयोग करते रहना चाहिए| इन चीजों से पेट की सफाई होती है और अंदरूनी गर्मी शांत होती है|
नारियल पानी गर्मियों के लिए सबसे बेहतर है. इसमें बहुत अध‍ि‍क मात्रा में कैल्‍िशयम, क्लोराइड और पोटैशि‍यम पाया जाता है.
गन्ने का रस- गर्मी में गन्ने का रस सेहत के लिये बहुत अच्छा होता है| इसमें विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं| इसे पीने से ताजगी बनी रहती है| लू नहीं लगती है| बुखार होने पर गन्ने का रस पीने से बुखार जल्दी उतर जाता है| एसीडीटी की वजह से होने वाली जलन में गन्ने का रस राहत पहुंचाता है| गन्ने के रस में नीम्बू मिलाकर पीने से पीलिया जल्दी ठीक होता है| गन्ने के रस में बर्फ मिलाना ठीक नहीं है|
कटहल गर्मियों में खूब पाया जाता है और ये बढ़े हुए ब्लडप्रेशर को कम करने में मददगार है.


योगर्ट में प्रोटीन की मात्रा अध‍िक और वसा कम होता है. ये वजन घटाने में भी बहुत मददगार है. ये पाचन तंत्र को भी बहुत मजबूत बनाता है.
आम पन्ना - कच्चे आम को पानी में उबालकर उसका गूदा निकाल लें| इसमें शकर,भुना जीरा,धनिया,पुदीना,नमक मिलाकर पीयें| गर्मी की बीमारियाँ दूर होंगी
खीरे को भी गर्मियों के लिए बहुत परफेक्ट माना जाता है. इसमें पानी की मात्रा बहुत अधिक होती है. ये ऑयली त्वचा को ठीक करता है. खीरा गर्मियों में होने वाले गैस, एसीडिटी, सीने में जलन की समस्याओं को भी दूर करता है.
ठंडाई- गर्मी में ठंडाई काफी लाभ दायक होती है| इसे बनाने के लिये खस खस और बादाम रात को भिगो दें|सुबह इन्हें मिक्सर में पीसकर ठन्डे दूध में मिलाएं| स्वाद अनुसार शकर मिलाकर पीएं| गर्मी से मुक्ति मिलेगी|
पुदीने का शरबत- गर्मी में पुदीना बेहद फायदेमंद रहता है| पुदीने को पीसकर स्वाद अनुसार नमक,चीनी जीरा मिलाएं| इस तरह पुदीने का शरबत बनाकर पीने से लू.जलन,बुखार ,उल्टी व गैस जैसी समस्याओं में काफी लाभ होता है|

24.4.17

गर्मियों में रहे सावधान! धूप,लू और बीमारियों से बचने के उपाय

   

   गर्मी के आगमन के साथ ही कई तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं। लोग इससे बचने के लिए तरह-तरह के उपाय करने लगते हैं। बढ़ती गर्मी में सबसे बड़ी समस्या होती है धूप की। इससे बचने के लिए पूरे शरीर को ढंकने के साथ ही कई और उपाय करने में जुट जाते हैं। अब गर्मी के कारण रोजमर्रा के कामों को तो छोड़ा नहीं जा सकता है, आपके शरीर में पानी की कमी न हो। ऐसे कौन से उपाय हैं जिन्हें अपनाकर आप तेज गर्मी से राहत पा सकते हैं।
   गर्मी में होने वाली गर्मी से थकावट, लू लगना, पानी की कमी, फूड पॉयजनिंग आम बीमारियां हैं। अगर हम कुछ सावधानियां बरतें तो इन बीमारियों से बचा जा सकता है।गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से लू लगने का खतरा बढ़ जाता है, खासकर धूप में घूमनेवालों, खिलाड़ियों, बच्चों, बूढ़े और बीमारों को लू लगने का डर ज्यादा रहता है। लू लगने पर उसके इलाज से बेहतर है, हम लू से बचे रहें यानी बचाव इलाज से बेहतर है।
*चश्मा पहनकर बाहर जाएं। चेहरे को कपड़े से ढक लें।
*घर से पानी या कोई ठंडा शरबत पीकर निकलें, जैसे आम पना, शिकंजी, खस का शर्बत आदि। साथ में भी पानी लेकर चलें।


* बहुत ज्यादा पसीना आया हो तो फौरन ठंडा पानी न पीएं। सादा पानी भी धीरे-धीरे करके पीएं।
* रोजाना नहाएं और शरीर को ठंडा रखें।
*घर को ठंडा रखने की कोशिश करें। खस के पर्दे, कूलर आदि का इस्तेमाल करें।
* बाजार से कटे हुए फल न लें।
*तेज गर्म हवाओं में बाहर जाने से बचें। नंगे बदन और नंगे पैर धूप में न निकलें।
* घर से बाहर पूरे और ढीले कपड़े पहनकर निकलें, ताकि उनमें हवा लगती रहे।
*ज्यादा टाइट और गहरे रंग के कपड़े न पहनें।
* सूती कपड़े पहनें। सिंथेटिक, नायलॉन और पॉलिएस्टर के कपड़े न पहनें।
*खाली पेट बाहर न जाएं और ज्यादा देर भूखे रहने से बचें।
*धूप से बचने के लिए छाते का इस्तेमाल करें। इसके अलावा, सिर पर गीला या सादा कपड़ा रखकर चलें।
*आयुर्वेद के अनुसार आमतौर पर लोग कफ, पित्त, वायु या इनमें से कोई दो प्रकृतियों वाले होते हैं। हम ठंडी तासीर या प्रकृति की चीजों का इस्तेमाल करते हैं तो हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म या चयापचय सिस्टम ठंडा होना शुरू हो जाता है और शरीर में ठंडक आने लगती है। चावल, जौ का पानी, केला, छाछ, दही, लस्सी आदि लेने से शरीर को ठंडक मिलती है। दूध की लस्सी भी ले सकते हैं। ज्यादातर सब्जियों की तासीर ठंडक देने वाली होती है। इनमें लौकी और तोरी सबसे ठंडी होती हैं। कफ प्रकृति वालों को लौकी, तोरी या इनका जूस ज्यादा नहीं लेना चाहिए। आम व लीची को छोड़कर ज्यादातर फल ठंडक देनेवाले होते हैं जैसे कि मौसमी, संतरा, आडू, चेरी, शरीफा, तरबूज, खरबूजा आदि। खीरा व ककड़ी भी गर्मियों के लिहाज से अच्छे हैं। सौंफ, इलायची, कच्चा प्याज, आंवला, धनिया, पुदीना और हरी मिर्च की तासीर भी ठंडी होती है। लू से बचाव के लिए कई तरह के पेय पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे कि ठंडाई, आम पना, शिकंजी, लस्सी, नारियल पानी आदि के साथ-साथ खस, ब्राह्मी,चंदन, बेल, फालसा, गुलाब, केवड़ा, सत्तू के शर्बत आदि का सेवन करें।


हीट एग्जाशन गर्मी की एक साधारण बीमारी है जिसके दौरान शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से 40 डिग्री सेल्सियस तक होता है। चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, कमजोरी, सिर दर्द और बेचैनी इसके मुख्य लक्षण हैं। इसका इलाज तुरंत ठंडक देना और पानी पीकर पानी की कमी दूर करना है। अगर हीट एग्जॉशन का इलाज तुरंत न किया जाए तो हीट-स्ट्रोक हो सकता है, जो कि जानलेवा भी साबित हो सकता है।
में शरीर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, जो कि अंदरुनी अंगों की कार्यप्रणाली को नष्ट कर सकता है। हीट-स्ट्रोक के मरीजों को शरीर का तापमान बहुत ज्यादा होता है, त्वचा सूखी और गर्म होती है, शरीर में पानी की कमी, कन्फयूजन, तेज या कमजोर नब्ज, छोटी-धीमी सांस, बेहोशी तक आ जाने की नौबत आ जाती है। हीट-स्ट्रोक से बचने के लिए दिन के सबसे ज्यादा गर्मी वाले समय में घर से बाहर मत निकलें। अत्यधिक मात्रा में पानी और जूस पीएं, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। ढीले-ढाले और हल्के रंग के कपड़े पहने।
*फूड पॉयजनिंग गर्मियों में आम तौर पर हो जाती है। गर्मियों में अगर खाना साफ-सुथरे माहौल में न बनाया जाए तो उसके दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही पीने का पानी भी दूषित हो सकता है। अत्यधिक तापमान की वजह से खाने में बैक्टीरीया बहुत तेजी से पनपते हैं, जिससे फूड पॉयजनिंग हो जाती है। सड़क किनारे बिकने वाले खाने-पीने के सामान भी फूड पॉयजनिंग के कारण बन सकते हैं। फूड पॉयजनिंग से बचने के लिए बाहर जाते वक्त हमेशा अपना पीने का पानी घर से ले के चलें। बाहर खुले में बिक रहे कटे हुए फल खाने से परहेज करें। गर्मी में शरीर में पानी की कमी से बचने के और शरीर में पानी की मात्रा को पर्याप्त बनाए रखने के लिए अत्यधिक मा़त्रा में तरल पदार्थ पिएं। खास तौर खेल-कूद की गतिविधियों के दौरान इस बात का ध्यान रखें। प्यास लगने का इंतजार न करें। हमेशा घर में बना हुआ नींबू पानी और ओआरएस का घोल आस-पास ही रखें। एल्कोहल और कैफीन युक्त पेय पदार्थों का परहेज करें, इनके सेवन से भी शरीर में पानी की कमी होती है।